BJP National Working President: भारतीय राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव की तस्वीर उस वक्त और स्पष्ट हो गई, जब बिहार सरकार में मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता नितिन नबीन को पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। महज 45 वर्ष की उम्र में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। इसके साथ ही वे न केवल भाजपा बल्कि देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में भी इस पद पर पहुंचने वाले सबसे युवा नेताओं में शामिल हो गए हैं।
कौन हैं नितिन नबीन ?
नितिन नबीन बिहार की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं। वे पांच बार विधायक रह चुके हैं,बिहार सरकार में कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं, संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर उनका अनुभव मजबूत माना जाता है पार्टी नेतृत्व का मानना है कि नबीन ने जमीनी राजनीति, संगठन निर्माण और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में संतुलन बनाकर काम किया है।
BJP National Working President: भाजपा में आगे की राह
नितिन नबीन की नियुक्ति को केवल एक पदभार नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा में इससे पहले भी ऐसा मॉडल अपनाया गया है। 2019 में अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, जो बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। ऐसे में नितिन नबीन को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अन्य दलों में उम्र और नेतृत्व का समीकरण
नितिन नबीन की उम्र को अगर अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के अध्यक्षों से तुलना करें, तो साफ दिखता है कि भाजपा नेतृत्व में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस: मल्लिकार्जुन खड़गे – 83 वर्ष, समाजवादी पार्टी: अखिलेश यादव – 52 वर्ष, एनसीपी (एसपी): शरद पवार – 85 वर्ष, नेशनल कॉन्फ्रेंस: उमर अब्दुल्ला – 55 वर्ष, तृणमूल कांग्रेस: ममता बनर्जी – 70 वर्ष, बसपा: मायावती – 69 वर्ष, डीएमके: एमके स्टालिन – 72 वर्ष इस तुलना में नितिन नबीन सबसे युवा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में सामने आते हैं।
पीएम मोदी की प्रतिक्रिया
नितिन नबीन की नियुक्ति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बधाई देते हुए लिखा कि वे एक कर्मठ, ऊर्जावान और संगठनात्मक अनुभव वाले नेता हैं। पीएम मोदी ने भरोसा जताया कि नबीन की ऊर्जा और प्रतिबद्धता पार्टी को और मजबूत बनाएगी।
राजनीति में संकेत क्या?
नितिन नबीन की नियुक्ति भाजपा की उस रणनीति की ओर इशारा करती है, जिसमें युवा नेतृत्व, संगठनात्मक अनुभव और जमीनी पकड़ को प्राथमिकता दी जा रही है। आने वाले समय में यह कदम देश की राजनीति में नेतृत्व की उम्र और सोच-दोनों को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।
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