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खनन माफियाओं ने अरावली में बची-खुची सभ्यता को भी खोद डाला!

Aravalli

Aravalli: अरावली पर हुई छेड़-छाड़ पर संसद से लेकर सड़क तक बड़ी बहसे हो रही हैं; इसी प्रसंग पर देखें, तो पता चलता है कि भारत का प्राचीन इतिहास भी जो यहा ंचटटानों पर चित्रित इतिहास था, उसको मिटा दिया। पहाड़ियों में अंकित सात हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेषों को भी उड़ा दिया। फतेपुर सीकरी के भदरौली, रसूलपुर, पतसाल व मदनपुरा के पास अरावली की चट्टानों पर बने प्राकृतिक आवासों को, और छतों पर प्रागैतिहासिक शैल चित्र बने हैं। वह युग था, जब मनुष्य ने पहले पहल चट्टानों में आवास बनाकर रहना शुरू किया था। लेकिन अब वह सभ्यता के अधिकांश अंश खनन से समाप्त हो गये हैं।

सात दशक पहले इन्हें खोजा गया था। लेकिन इन अवशेषों को अभी तक पुरातत्व विभाग ने सुरक्षित नहीं रख सका। एएसआइ संरक्षित स्मारक फतेपुर सीकरी से करीब 5 किमी की दूरी पर स्थित राक शेल्टर्स यानी शैलाश्रय में एक पेंटिंग बनी हुई है। यह लाल, काले और गेरू रंग से बनी हुई है। यह उत्तर पाषाणकाल यानि 7 हजार वर्ष पहले से लेकर गुप्त काल तक की मानी जाती है। इनमें हिरण, मवेशी, कूबड़ वाला बैल, बंदर, बाघ ,शेर और बिल्ली आदि जानवरों के चित्र शामिल हैं।

यहीं खनन माफियाओं ने पूरे क्षेत्र में खनन कर प्राचीन सभ्यता के अवशेषों को उजाड़ दिया है। यानी पूरी पहाड़ियों को समतल कर दिया है। चट्टाने समतल कर दी हैं। स्थानीय लोग भी अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए खनन करते हैं। इससे पहाड़ियांे में बचे शैलचित्र भी समाप्ति की ओर हैं। अब नये सिरे से दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली पर्वतमाला की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय देगा। इससे पूर्व कोर्ट ने फैसला दिया था, उस पर फिलहाल रोक लगा दी है। आज प्रश्न अरावली का है, क्योंकि वह क्रेद्र में है। देश की राजधानी भी इसी पर्वतमाला पर स्थित है। इसलिए अब सबको आभास हो रहा है कि खनन पहाड़ियों का नहीं होना चाहिए। पर्यावरण को नुकसान करने वाली खनन प्रक्रिया सिर्फ दिल्ली के पास ही नहीं, यह सारे देश में चल रही है।

यदि वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रकृति के साथ कार्य होगा, उसका दोहन होगा, तो नुकसान की गुंजाइश कम रहेगी। विकास के लिए नुकसान तो सहना ही पड़ेगा, लेकिन उसकी भरपाई हराभरा जीवन करने के लिए , प्रकृति को भी जीवित रहने की प्रक्रिया हमको भी करनी होगी। प्रकृति के साथ सहचर्य जरूरी है।

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