Lakhimpur Kheri: लखीमपुर खीरी जनपद के सिंगाही थाना क्षेत्र में खनन माफियाओं और प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ किसानों का गुस्सा फूट पड़ा है। जौरहा नाले पर आवंटित खनन पट्टे को निरस्त करने की मांग को लेकर किसान और सिख संगठन के लोग लगातार दूसरे दिन भी भारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। मांझा गांव के पास नाले के किनारे कड़कड़ाती ठंड और खुले आसमान के नीचे बैठे ये किसान अपनी जमीन और आजीविका बचाने के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई लड़ रहे हैं।
बेमौसम बारिश और बाढ़ के बीच ‘खनन’ का खतरा
प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि यह क्षेत्र पहले से ही बाढ़ और कटान की विभीषिका झेलता आ रहा है। जौरहा नाला (जो सरकारी अभिलेखों में नाला दर्ज है) यहाँ के किसानों के लिए सुरक्षा कवच की तरह है। किसान नेता परमजीत सिंह पम्मी और जसवीर सिंह बाजवा ने बताया कि यदि यहाँ से बालू का अवैध खनन शुरू हुआ, तो नाले का स्वरूप बदल जाएगा, जिससे भविष्य में कटान की समस्या और भी विकराल हो जाएगी। किसानों को डर है कि उनकी उपजाऊ जमीनें नाले की भेंट चढ़ जाएंगी। खनन ठेकेदारों ने रेत निकासी के लिए अपने फायदे हेतु नाले के भीतर होम पाइप डालकर एक अस्थायी पुल का निर्माण कर लिया है। किसानों का आरोप है कि यह पुल न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इससे जल प्रवाह बाधित होगा जो बाढ़ के समय तबाही का सबब बनेगा। प्रदर्शनकारियों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि दो दिनों के भीतर पट्टा निरस्त नहीं हुआ, तो वे स्वयं इस अस्थायी पुल को हटा देंगे।

Lakhimpur Kheri: लंगर और बच्चों के साथ मोर्चाबंदी
प्रशासनिक संवेदनहीनता का आलम यह है कि किसान दो बार जिलाधिकारी से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। थक-हारकर किसान अब अपने मासूम बच्चों और परिवारों के साथ धरना स्थल पर ही डट गए हैं। वहीं पर लंगर (सामुदायिक रसोई) की व्यवस्था की गई है। मांझा गांव के पूर्व प्रधान संतोष कुमार राज ने कहा कि जब तक पट्टा रद्द नहीं होता, कोई भी किसान पीछे नहीं हटेगा। हैरानी की बात यह है कि धरना दूसरे दिन भी जारी है, लेकिन अब तक कोई जिम्मेदार अधिकारी या क्षेत्र का जनप्रतिनिधि किसानों की सुध लेने नहीं पहुँचा है। भीषण ठंड में बच्चों के साथ खुले टेंट में बैठे किसानों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।
ये है प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग…
- जौरहा नाले पर आवंटित खनन पट्टे को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।
- नाले के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ कर बनाए गए अस्थायी पुल को हटाया जाए।
- क्षेत्र को बाढ़ और कटान से बचाने के लिए ठोस योजना बनाई जाए।
आपको बता दें कि यह धरना केवल एक पट्टे का विरोध नहीं है, बल्कि यह किसानों के अस्तित्व की रक्षा का सवाल है। एक तरफ सरकार ‘किसान हित’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ खनन के नाम पर किसानों की जमीनों को खतरे में डालना प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाता है। अब देखना यह होगा कि क्या लखीमपुर प्रशासन इस संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप करेगा या किसानों का यह संघर्ष और उग्र रूप लेगा।
Report BY: संजय कुमार राठौर







