bangladesh election news: बांग्लादेश में 12 फरवरी को प्रस्तावित आम चुनाव के लिए प्रचार जैसे-जैसे तेज हो रहा है, वैसे-वैसे राजनीति में धर्म के खुले इस्तेमाल ने गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। कुछ राजनीतिक दल यह दावा कर रहे हैं कि उनके खिलाफ मतदान करना इस्लाम के खिलाफ मतदान करने के समान है। गुरुवार को सामने आई एक रिपोर्ट में इसे राजनीतिक वैधता पर संकट के समय विरोधियों को “धर्म-विरोधी” ठहराने की पुरानी और खतरनाक रणनीति बताया गया है।
सांस्कृतिक गतिविधियों पर बढ़ता धार्मिक दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक आधार पर संगीत शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, मजारों पर हमले हो रहे हैं, रंगमंच को धमकियां मिल रही हैं और पाठ्यपुस्तकों में मनमाने बदलाव किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये घटनाएं बांग्लादेश के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने के लिए गंभीर खतरे का संकेत हैं।
bangladesh election news: धर्म के नाम पर सत्ता, निशाने पर अल्पसंख्यक
बांग्लादेश के प्रमुख बंगाली दैनिक प्रथम आलो में लिखते हुए लेखक और स्तंभकार हसन फ़िरदौस ने कहा कि धर्म का इस्तेमाल लंबे समय से दमनकारी कार्रवाइयों को ठहराने के लिए किया जाता रहा है। उन्होंने 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा बंगालियों के खिलाफ किए गए नरसंहार का हवाला देते हुए लिखा कि आज भी राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। उनके अनुसार, जब नेता धर्म को सत्ता की ढाल बनाते हैं, तो सबसे पहले अल्पसंख्यक समुदायों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। बांग्लादेश में सोशल मीडिया पोस्ट या टिप्पणियों के आधार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
महिलाओं की भूमिका सीमित करने की रणनीति
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि हाल ही में एक राजनीतिक दल ने महिलाओं के कार्य घंटे घटाकर प्रतिदिन पांच घंटे करने का सुझाव दिया है। इसे एक दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक प्रतिस्पर्धा से बाहर कर उन्हें घरेलू दायरे तक सीमित करना है।
bangladesh election news: जमात-ए-इस्लामी का दोहरा रुख
प्रथम आलो की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी सार्वजनिक रूप से संकेत देती है कि सत्ता में आने पर वह शरिया कानून लागू नहीं करेगी, लेकिन पार्टी के नेता टेलीविजन बहसों में खुलेआम शरिया लागू करने की वकालत करते नजर आते हैं।
जमीनी स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव चिह्न ‘दारिपल्ला’ (तराजू) को वोट देने को धार्मिक कर्तव्य बताकर प्रचार कर रहे हैं, जिसे कुछ स्थानों पर “जन्नत का टिकट” तक कहा जा रहा है।
राजनीति और धर्म के खतरनाक संगम पर बांग्लादेश
रिपोर्ट के मुताबिक, एक ओर पार्टी नेतृत्व संयम का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शरिया आधारित नैरेटिव को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। यह विरोधाभास बांग्लादेश को धर्म और राजनीति के एक बेहद संवेदनशील और जटिल मोड़ पर ले आया है।
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