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बिहार में ‘नीलगाय’ शब्द पर रोक, अब ‘घोड़ पड़ास’ या ‘नील बकरी’ कहेगी सरकार

बिहार सरकार ने ‘नीलगाय’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला लिया है। मंगलवार को विधानसभा में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि अब राज्य में ‘नीलगाय’ की जगह ‘घोड़ पड़ास’ या ‘नील बकरी’ शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। वैशाली, पूर्वी चंपारण, बक्सर, सीवान और समस्तीपुर समेत कई जिलों में इन जानवरों को नियंत्रित करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अनुमान है कि इन जिलों में घोड़ पड़ास की संख्या करीब 3 लाख है, जबकि जंगली सूअरों की आबादी लगभग 67 हजार बताई जाती है।

Bihar news: बिहार सरकार ने ‘नीलगाय’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला लिया है। मंगलवार को विधानसभा में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि अब राज्य में ‘नीलगाय’ की जगह ‘घोड़ पड़ास’ या ‘नील बकरी’ शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने साफ किया कि सरकारी दस्तावेजों, योजनाओं और सवाल-जवाब में भी ‘नीलगाय’ शब्द का प्रयोग नहीं किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस शब्द से लोगों की धार्मिक और सामाजिक भावनाएं जुड़ी रहती हैं।

शब्द बदलने के पीछे क्या वजह?

उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि यह केवल शब्द बदलने का मामला नहीं है, बल्कि समाज की भावनाओं का सम्मान करने की दिशा में उठाया गया कदम है। उनका कहना है कि ‘नीलगाय’ शब्द के कारण इस जानवर को लेकर लोगों में भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है, जिससे इससे जुड़ी नीतियों को लागू करने में मुश्किलें आती हैं।

Bihar news: किसानों की फसल को बड़ा नुकसान

दरअसल, घोड़ पड़ास यानी नील बकरी खेतों में घुसकर फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती है। किसानों का कहना है कि इन जानवरों की वजह से उन्हें हर साल बड़ी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। फसलों को बचाने के लिए कई इलाकों में सरकार ने इन्हें मारने की अनुमति भी दी है और इसके लिए शूटर तक तैनात किए गए हैं।

कई जिलों में चल रहा अभियान

Bihar news: वैशाली, पूर्वी चंपारण, बक्सर, सीवान और समस्तीपुर समेत कई जिलों में इन जानवरों को नियंत्रित करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अनुमान है कि इन जिलों में घोड़ पड़ास की संख्या करीब 3 लाख है, जबकि जंगली सूअरों की आबादी लगभग 67 हजार बताई जाती है। ये जानवर झुंड में चलते हैं और एक ही दिन में एकड़ भर फसल बर्बाद कर देते हैं। हालात ऐसे हैं कि कई जिलों में किसान अपनी तैयार फसल को बचाने के लिए पूरी रात खेतों में पहरा देने को मजबूर हैं।

 

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