Lakhimpur Kheri: उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी की तहसील मोहम्मदी इन दिनों अवैध खनन के एक ऐसे मकड़जाल में फंसी है, जहाँ कानून की किताबें फाइलों में दबी हैं और माफियाओं के ट्रैक्टर-ट्राली सड़कों पर दहाड़ रहे हैं। गन्ने की मिठास वाले इस क्षेत्र की आबोहवा में अब मिट्टी और बालू के अवैध कारोबार का जहर घुलने लगा है। यहाँ ईंट भट्ठों की रॉयल्टी के नाम पर सफ़ेद बालू का वो काला कारोबार चल रहा है, जिसने न केवल पर्यावरण को खतरे में डाल दिया है, बल्कि सरकारी राजस्व को भी भारी चपत लगाई जा रही है।
किसानों का ‘हितैषी’ बनने का ढोंग
मोहम्मदी के गोमती तटवर्ती इलाकों, विशेषकर ग्राम पंचायत नायगांव मोहम्मदी सराय में खनन माफियाओं ने एक नया और ‘सफेदपोश’ तरीका ईजाद किया है। गोमती नदी के किनारे स्थित खेतों की भौगोलिक स्थिति प्रायः ऊंची-नीची है, जिससे किसानों को खेती करने में काफी पसीना बहाना पड़ता है। खनन माफिया इसी मजबूरी का फायदा उठाते हैं।
सूत्रों के अनुसार, माफिया सबसे पहले किसानों को यह झांसा देते हैं कि वे उनके ऊंचे खेतों की मिट्टी निकालकर उसे पूरी तरह समतल और कृषि योग्य बना देंगे। भोले-भाले किसान इस उम्मीद में अपनी जमीन माफियाओं को सौंप देते हैं कि उनकी बंजर सी दिखने वाली जमीन उपजाऊ हो जाएगी। लेकिन हकीकत में, मिट्टी की ऊपरी परत हटाने के बाद शुरू होता है असली खेल— ‘कीमती सफेद बालू’ की निकासी।
हाल ही में एक शिकायत पर मोहम्मदी प्रशासन द्वारा गठित जांच टीम ने जब मौके पर छापा मारा, तो वहाँ का नजारा देखकर अधिकारी भी दंग रह गए। जांच रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चीख-चीख कर माफिया और ईंट भट्ठा मालिकों की साठ-गांठ बयां कर रहे हैं। जांच टीम ने पाया कि जिन खेतों से धड़ल्ले से बालू निकाली जा रही थी, उन खेतों के गाटा नंबर बाकायदा एक स्थानीय ईंट भट्ठे की रॉयल्टी पर चढ़े हुए थे। नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए मौके पर लगभग तीन मीटर (करीब 10 फीट) से ज्यादा गहरी खुदाई पाई गई। जबकि नियमानुसार ईंट भट्ठे के लिए मिट्टी खनन की एक सीमित गहराई तय होती है। यहाँ भट्ठे के नाम पर रॉयल्टी ली गई मिट्टी की, लेकिन निकाला गया बालू का खजाना। प्रशासन ने इस गंभीर मामले की रिपोर्ट तैयार कर अब जिला खान अधिकारी के पाले में डाल दी है।
Lakhimpur Kheri: क्या सिर्फ रॉयल्टी ही मानक है?
इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय प्रशासन और खनन विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या ईंट भट्ठा मालिकों की कोई जिम्मेदारी तय नहीं है?
* रॉयल्टी का खेल: क्या सिर्फ रॉयल्टी के नाम पर खेतों की गाटा संख्या चढ़वा देने भर से माफियाओं को जमीन का सीना चीरने की खुली छूट मिल जाती है?
* निगरानी का अभाव: जिला प्रशासन और स्थानीय तहसील प्रशासन रॉयल्टी जमा कराने के बाद आँखें क्यों मूंद लेता है? खनन की परमिशन देने के बाद क्या यह सुनिश्चित करना अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है कि खुदाई तय मानकों के भीतर हो रही है या नहीं?
* इति श्री की नीति: अक्सर देखा गया है कि परमिशन मिलने के बाद माफिया चाहे जितनी गहराई से बालू निकालें, प्रशासन कभी दोबारा मुड़कर जांच नहीं करता।
Report By: संजय कुमार







