UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम नेतृत्व को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का समाजवादी पार्टी में शामिल होना कई नए सवाल खड़े कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी मुस्लिम राजनीति में नए चेहरे को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है, और क्या यह कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा है?
आजम खान की अनुपस्थिति और सपा की चुनौती
बीते तीन दशकों में आजम खान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। वे समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे और मुलायम सिंह यादव के करीबी सहयोगी माने जाते थे। अपनी तेज-तर्रार शैली और धारदार भाषणों के लिए पहचाने जाने वाले आजम खान लंबे समय से कानूनी मामलों में उलझे रहे हैं, जिससे सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका सीमित हो गई है। ऐसे में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट बनाए रखने की है। पार्टी नेतृत्व के आसपास फिलहाल कोई ऐसा बड़ा मुस्लिम चेहरा नजर नहीं आता, जो पूरे प्रदेश में व्यापक स्वीकार्यता रखता हो।
UP Politics: रणनीति या संयोग?
पूर्व बसपा नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर कई पड़ावों से गुजरा है। बहुजन समाज पार्टी की सरकार में वे कद्दावर मंत्री रहे। बाद में बसपा से निकाले जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा, लेकिन वहां भी वे अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत नहीं कर पाए। हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा देकर उन्होंने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उनकी सपा में एंट्री को महज राजनीतिक पुनर्स्थापन नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा मुस्लिम मतदाताओं को संदेश देना चाहती है कि पार्टी के पास विकल्प मौजूद हैं और वह नेतृत्व के स्तर पर खालीपन नहीं रहने देगी। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि आजम खान जैसी जनस्वीकार्यता और भाषण शैली नसीमुद्दीन सिद्दीकी में फिलहाल नजर नहीं आती। ऐसे में उन्हें सीधे तौर पर ‘रिप्लेसमेंट’ कहना जल्दबाजी होगी।
मुस्लिम वोटों पर बढ़ती राजनीतिक नजर
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए मुस्लिम वोटों पर सभी दलों की नजर है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है। वहीं मायावती लगातार मुस्लिम समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में हैं। कांग्रेस भी सक्रिय दिखाई दे रही है। दूसरी ओर भाजपा ने पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे को उठाकर नई सामाजिक रणनीति तैयार की है। ऐसे हालात में समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम वोटों का बिखराव बड़ा खतरा बन सकता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 18-20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि इन वोटों में विभाजन होता है तो उसका सीधा नुकसान सपा को हो सकता है। फिलहाल, यह कहना मुश्किल है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी आजम खान का विकल्प बन पाएंगे या नहीं। लेकिन इतना तय है कि उनकी एंट्री ने मुस्लिम राजनीति और सपा की चुनावी रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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