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शतक फिल्म समीक्षा: साहस और समर्पण की सदी, आरएसएस के पहले 50 साल और आने वाली 50 वर्षों की प्रेरक कहानी

‘शतक’ सिर्फ इतिहास नहीं है; यह आरएसएस की 50 साल की यात्रा और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका का जीवंत चित्रण है। फिल्म में साहस, आस्था और समर्पण के भाव दर्शकों के दिलों तक पहुंचते हैं। डॉ. हेडगेवार और युवा स्वयंसेवकों की प्रेरक कहानियां इसे मार्मिक और अविस्मरणीय बनाती हैं।
शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी

Shatak Movie Review: ‘शतक’ फिल्म राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इतिहास और उसके योगदान को पर्दे पर जीवंत रूप में पेश करती है। दशकों से आरएसएस के बारे में कई बातें कही गई हैं, आलोचना हुई और बहस भी हुई। यह फिल्म सिर्फ घटनाओं को दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों के साहस, दृढ़ विश्वास और समर्पण को सामने लाती है जिन्होंने भारत के सबसे प्रभावशाली आंदोलनों में से एक को आकार दिया।

Shatak Movie Review: शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी
शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी

आरएसएस की 50 साल की कहानी

फिल्म आरएसएस के पहले 50 वर्षों को विस्तार से दर्शाती है और आने वाले 50 वर्षों की संभावित कहानी को भी सामने लाती है। यह एक ऐसी सिनेमाई यात्रा है, जो दर्शकों को इतिहास के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ती है और भविष्य में आने वाली घटनाओं के लिए उत्साहित करती है।

शुरुआत से ही ‘शतक’ ऐतिहासिक कहानी कहने का बेहतरीन उदाहरण बन जाती है। यह फिल्म लाइव-एक्शन और अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करती है, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं। इन तकनीकों का इस्तेमाल ऐतिहासिक हस्तियों और महत्वपूर्ण क्षणों को यथार्थ रूप में पेश करने के लिए किया गया है।

डॉ. हेडगेवार का प्रेरक जीवन

फिल्म में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का चित्रण बहुत मार्मिक तरीके से किया गया है। वह ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने अनुशासन, चरित्र और सेवा के प्रति अटूट विश्वास से आरएसएस की नींव रखी। उनके प्रारंभिक जीवन, सादगी और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनके बलिदान दर्शकों को उनके दूरदर्शी व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं।

शुरुआती दृश्य छोटे सभाओं और खुले मैदान में आरंभ होते हैं। ये सादगी और प्रतिबद्धता दर्शाती हैं कि बड़े आंदोलन अक्सर साधारण शुरुआत से उत्पन्न होते हैं। धीरे-धीरे कहानी गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर के नेतृत्व की ओर बढ़ती है। इस दौरान फिल्म में आत्मनिरीक्षण, तनाव और दृढ़ता के क्षणों को दर्शाया गया है।

शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी
शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी

आरएसएस पर लगे प्रतिबंध दिखाए

फिल्म स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंधों को भी सूक्ष्म तरीके से दिखाती है। संगठन के पुनर्निर्माण और रणनीतिक दूरदर्शिता को बारीकी से प्रस्तुत किया गया है। यह दर्शकों को संगठन के महत्व और उसके प्रयासों की गहराई समझने का अवसर देती है।

‘शतक’ सिर्फ संगठन के इतिहास पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह भारत के राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण क्षणों को भी पेश करती है। दादर और नागर हवेली की मुक्ति को शांत और गरिमामय तरीके से दिखाया गया है। इसके अलावा, कश्मीर की सुरक्षा और अशांत समय में दिए गए मार्गदर्शन को संवेदनशीलता के साथ पेश किया गया है। ये दृश्य साहस, दूरदर्शिता और सेवा की भावना को उजागर करते हैं। फिल्म में मानव कहानियों को खास महत्व दिया गया है।

भय, संघर्ष और समर्पण की झलक

युवा स्वयंसेवकों का घर छोड़ना, परिवार की चिंता और बड़ी जिम्मेदारी उठाना, इन सब भावनाओं को बखूबी दिखाया गया है। दर्शक उनके डर, संघर्ष और समर्पण को महसूस कर पाते हैं। प्रत्येक दृश्य इतनी सावधानी और ठहराव के साथ पेश किया गया है कि दर्शक इतिहास को व्यक्तिगत और मार्मिक रूप में अनुभव कर सकें।

फिल्म ‘शतक’ की टीम ने इसे बनाने में पूरी मेहनत की है। अनिल धनपत अग्रवाल की परिकल्पना, आशीष मल्ल का निर्देशन, और वीर कपूर व आशीष तिवारी का सह-निर्माण फिल्म को वास्तविक, प्रेरक और भावपूर्ण बनाता है। फिल्म बनाने में रचनात्मक निर्णय इतिहास और संगठन के प्रति सम्मान को दर्शाते हैं।

शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी
शतक फिल्म: साहस और समर्पण की कहानी

शतक: इतिहास से आगे की कहानी

‘शतक’ सिर्फ इतिहास दिखाने वाली फिल्म नहीं है। यह दृढ़ विश्वास, साहस और सेवा की भावनाओं की पड़ताल है। यह दर्शकों को दिखाती है कि किसी आंदोलन के पीछे ऐसे लोग होते हैं, जो अपने जीवन को किसी बड़े विचार के लिए समर्पित करते हैं। फिल्म के अंत तक दर्शक आरएसएस की एक सदी लंबी यात्रा, राष्ट्र निर्माण में इसकी भूमिका और उसके सदस्यों की प्रतिबद्धता का सम्मान लेकर निकलते हैं।

इतिहास को जीने का अनुभव

संक्षेप में, ‘शतक’ आस्था, दृढ़ता और समर्पण का एक सिनेमाई उत्सव है। यह मार्मिक, प्रेरक और अविस्मरणीय है। यह फिल्म इतिहास को न केवल दिखाती है, बल्कि उसे जीने का अनुभव देती है और उन लोगों की प्रशंसा कराती है जिन्होंने इसे आकार दिया।

निर्माण टीम में शामिल हैं: निर्देशक आशीष मल्ल, निर्माता वीर कपूर, सह-निर्माता आशीष तिवारी, सहयोगी निर्माता अशोक प्रधान, मयंक पटेल और कबीर सदानंद, लेखक नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान, कार्यकारी निर्माता अभिनव शिव तिवारी, और परिकल्पना अनिल धनपत अग्रवाल।

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