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Braj Ki Holi 2026: क्यों मनाते हैं बरसाना में लट्ठमार होली, कैसे हुई इसकी शुरुआत

Braj Ki Holi 2026: क्यों मनाते हैं बरसाना में लट्ठमार होली, कैसे हुई इसकी शुरुआत

Braj Ki Holi 2026: ब्रज की धरती पर मनाई जाने वाली होली पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखती है, लेकिन बरसाना की लट्ठमार होली का रंग सबसे निराला माना जाता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और राधा-कृष्ण की लोककथाओं से जुड़ा जीवंत उत्सव है। हर साल फाल्गुन के महीने में जैसे ही होली का मौसम शुरू होता है, बरसाना और नंदगांव की गलियां भक्ति और उत्साह से भर उठती हैं।

राधा-कृष्ण की कथा से जुड़ी शुरुआत

लोकमान्यताओं के अनुसार लट्ठमार होली की शुरुआत उस प्रसंग से मानी जाती है जब नंदगांव से श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आए थे। कहा जाता है कि कृष्ण ने राधा और उनकी सखियों से हंसी-मजाक किया, जिसके जवाब में सखियों ने उन्हें लाठियों से खदेड़ा। यह घटना प्रेम और नटखटपन का प्रतीक बन गई। समय बीतने के साथ यही प्रसंग परंपरा में बदल गया और बरसाना की लट्ठमार होली के रूप में प्रसिद्ध हो गया। आज भी उसी स्मृति को जीवित रखते हुए नंदगांव के पुरुष हुरियारे बनकर बरसाना आते हैं और यहां की महिलाएं सखियों के रूप में उनका स्वागत लाठियों से करती हैं।

Braj Ki Holi 2026: 40 दिन तक चलता है ब्रज का होली उत्सव

ब्रज में होली केवल एक-दो दिन का त्योहार नहीं है। बसंत पंचमी से इसकी शुरुआत मानी जाती है और फाल्गुन पूर्णिमा तक करीब चालीस दिनों तक अलग-अलग मंदिरों और गलियों में फाग, रंग और रसिया गूंजते रहते हैं। बरसाना की लट्ठमार होली इस पूरे उत्सव का सबसे आकर्षक और चर्चित हिस्सा है। इस दौरान राधा रानी मंदिर और आसपास की रंगीली गलियों में विशेष आयोजन होते हैं और हजारों श्रद्धालु इस अनोखी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।

Braj Ki Holi 2026: कैसे खेली जाती है लट्ठमार होली

लट्ठमार होली के दिन नंदगांव के हुरियारे पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे बरसाना पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों और गीतों के बीच उनका स्वागत होता है। जैसे ही वे रंगीली गलियों में प्रवेश करते हैं, बरसाना की महिलाएं हाथों में लाठियां लेकर तैयार खड़ी रहती हैं। प्रेम-परंपरा के इस प्रतीकात्मक आयोजन में महिलाएं लाठियां चलाती हैं और हुरियारे ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं। पूरा माहौल हंसी-ठिठोली, गीत-संगीत और भक्ति से भरा रहता है।

एक महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी

बरसाना की महिलाएं होली से करीब एक महीना पहले लाठियों की तैयारी शुरू कर देती हैं। लाठियों पर तेल लगाया जाता है ताकि वे मजबूत और लचीली रहें। उन्हें सजाया भी जाता है और उनके आकार का चुनाव महिला की लंबाई और सुविधा के अनुसार किया जाता है। कई घरों में यह तैयारी परंपरागत ढंग से होती है और बड़ी महिलाएं नई पीढ़ी को इसकी बारीकियां सिखाती हैं। यह तैयारी केवल रस्म नहीं, बल्कि गर्व और परंपरा का हिस्सा मानी जाती है।

Braj Ki Holi 2026: हुरियारों की ढाल का विशेष महत्व

लाठियों के प्रहार से बचने के लिए हुरियारे मजबूत ढाल लेकर आते हैं। इन ढालों को खास तौर पर तैयार किया जाता है और इनका वजन कई बार सात से आठ किलो तक होता है। इन्हें संभालना आसान नहीं होता, इसलिए हुरियारे पहले से अभ्यास भी करते हैं। कई कारीगर पीढ़ियों से ढाल बनाने का काम करते आ रहे हैं और होली से करीब डेढ़ महीने पहले ही इनकी मरम्मत और निर्माण शुरू हो जाता है।स्थानीय परंपरा के अनुसार लट्ठमार होली में लाठी चलाने का अधिकार केवल बरसाना की विवाहित महिलाओं को होता है। इन्हें हुरियारन कहा जाता है। कुंवारी लड़कियां आमतौर पर दर्शक के रूप में मौजूद रहती हैं और गीत गाकर माहौल को जीवंत बनाती हैं। महिलाएं पारंपरिक लहंगा-ओढ़नी पहनकर समूह में आती हैं और फाग गाते हुए इस परंपरा को निभाती हैं।

भक्ति और सुरक्षा दोनों का संतुलन

लट्ठमार होली के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक बरसाना पहुंचते हैं। भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से विशेष इंतजाम किए जाते हैं। गलियों में आवाजाही नियंत्रित रहती है और लोगों को सुरक्षित तरीके से आयोजन देखने की सलाह दी जाती है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और फाग गायन भी होता है, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति और रंग में डूबा रहता है।बरसाना की लट्ठमार होली केवल लाठी और ढाल का खेल नहीं है। यह ब्रज संस्कृति की पहचान है, जिसमें प्रेम, हास-परिहास और आस्था का अनोखा संगम दिखाई देता है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। जब रंगीली गलियों में सखियां लाठियां उठाती हैं और हुरियारे ढाल संभालते हैं, तब यह दृश्य केवल उत्सव नहीं बल्कि इतिहास और लोकआस्था का जीवंत रूप बन जाता है।

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