Andhra Pradesh: आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले से एक बेहद मार्मिक घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया। एक सरकारी कर्मचारी अपनी चार साल की बेटी के जन्मदिन पर केक खरीद पाने की चिंता और गहरे आर्थिक तनाव से इतना टूट गया कि उसने जीवन समाप्त करने का फैसला कर लिया। इस घटना ने न सिर्फ परिवार, बल्कि समाज के सामने आर्थिक दबाव और मानसिक पीड़ा की गंभीर सच्चाई रख दी है।रामसमुद्रम निवासी 36 वर्षीय सुब्रमण्यम राज्य सचिवालय में सहायक के पद पर कार्यरत थे। पिछले वर्ष जुलाई में उनका तबादला बी. कोथाकोटा नगर पंचायत कार्यालय में हुआ था। परिवार में पत्नी सौम्या और दो छोटी बेटियां ऐश्वर्या और हिंदवी हैं। परिवार रामसमुद्रम बाईपास रोड के पास रहता था और सामान्य जीवन जी रहा था, लेकिन भीतर ही भीतर आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही थीं।
Andhra Pradesh: जन्मदिन की सुबह और अधूरा वादा
8 फरवरी को रविवार होने के कारण सुब्रमण्यम परिवार के साथ कर्नाटक के नागरेट्टी गांव, अपनी सास के घर गए थे। अगले दिन 9 फरवरी को बड़ी बेटी ऐश्वर्या का चौथा जन्मदिन था। सुबह घर से निकलते वक्त उन्होंने भरोसा दिलाया था कि शाम को लौटते समय केक ले आएंगे। नन्ही ऐश्वर्या पूरे दिन उसी इंतज़ार में थी।
Andhra Pradesh: मां से आख़िरी बातचीत और बढ़ता तनाव
सुबह करीब 7:50 बजे सुब्रमण्यम ने अपनी मां नीलमम्मा को फोन किया। आवाज़ भारी थी, शब्द डगमगा रहे थे। मां ने कारण पूछा तो उन्होंने बात टाल दी। परिवार के मुताबिक, इसी दौरान आर्थिक संकट ने उन्हें पूरी तरह घेर लिया था—इतना कि जन्मदिन का केक खरीदने तक की चिंता उन्हें अंदर से तोड़ रही थी।मां को बेटे की बेचैनी समझ आ गई। उन्होंने तुरंत बहू सौम्या से संपर्क किया। इसके बाद लगातार कॉल किए गए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। सुब्रमण्यम के फोन में पत्नी के लिए लिखा एक संदेश ड्राफ्ट में मिला मैं तुम्हें और बच्चों को दर्द देकर जा रहा हूं, मुझे माफ करना जो भेजा नहीं जा सका। कुछ समय बाद पड़ोसियों को संदेह हुआ, दरवाज़ा खोला गया और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
पुलिस जांच और सवालों की गूंज
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची, आवश्यक कार्रवाई की और मामले की जांच शुरू कर दी है। यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है क्या आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव समय पर पहचान लिए जाते तो एक पिता की जान बच सकती थी?यह हादसा याद दिलाता है कि आर्थिक तंगी और मानसिक बोझ किसी को भी अंदर से तोड़ सकते हैं। ऐसे समय में बातचीत, मदद और सहारे की अहमियत सबसे ज़्यादा होती है। अगर आप या आपके आसपास कोई भारी तनाव से जूझ रहा है, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें या स्थानीय सहायता सेवाओं से संपर्क करें। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि हिम्मत की निशानी है।
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