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अरावली हिल को छेड़ा तो राजधानी में जीना दूभर!

Aravalli

Aravalli: अरावली हिल आजकल चर्चा में है, होना भी चाहिए, क्योंकि, जीवन के क्रम को चलाने के लिए पहाड़ियों का महत्व है। हवा, पानी हमें ये पहाड़ियां दे रही हैं। अरावली की रेंज दिल्ली से शुरू होती है। अरावली पर्वत माला उत्तर पश्चिम भारत में स्थिति है। यह पर्वत श्रृंखला 670 किलोमीटर की है। यह दक्षिण पश्चिम दिशा में फैली हुई है। दिल्ली से शुरू होकर दक्षिण हरियाणा और राजस्थान से होते हुए गुजरात के अहदाबाद में समाप्त होती है। इसकी सबसे उूंची चोटी राजस्थान के माउंट आबू में स्थित गुरु शिखर है, यहां पर इसकी उूंचाई 1,722 मीटर है। अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है, यह पैलियोप्रोटेरोजोइक युग की है।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने नवंबर-दिसंबर 2025 के अपने आदेश में मरुस्थलीयकरण के खिलाफ एक बाधा, भूजल रिचार्ज क्षेत्र और जैव विविधता आवास के रूप में अरावली पर्वतमाला के पारिस्थितिक महत्त्व पर जोर दिया। इस अरावली पर्वतमाला, जो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। ऐतिहासिक रूप से इस रेंज को राज्य सरकारों ने इससे जुड़े 37 जिलों को अरावली रेंज की मान्यता दी है। क्योंकि इस पर्वत श्रृंखला ने देश काी पारिस्थितिक को स्थाइत्व देने में बहुत बड़ा काम किया है। रेगिस्ताानीकरण रोकने, जैव विविधता और जल को भंडारित करने में इस रेंज में पैदा हुई वनस्पतियां और जंगल ने काम किया है। आज जब देश में जनसंख्या के दबाव से जंगलों का शहरीकरण हो रहा है, तब विकास के नाम पर सरकारें भी जंगलों का आंख मंूद कर कटाई करने में आगे है, बगैर वैज्ञानिक परिस्थितियों के जाने इस पर्वतमाला को रौंधने का प्रयास चल रहा है।

वैसे सौ मीटर से उूंची दो आस-पास की पहाड़ियों को जो 500 मीटर के दायरे में है। इन सभी पहाड़ियों को माइनिंग लीज देने से अलग रखा गया है। इसलिए यह बात नहीं बनती कि 100 मीटर से कम उूंचाई वाली सभी पहाड़ियों को खनन के लिए उचित माना जाए। वैसे अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी उूंचाई 100 मीटर या उससे अधिक हो , उसे अरावली पहाड़ी कहा जाएगा। सरकारों ने इन पहाड़ियों को संरक्षित करने के लिए पहाड़ियों के आकार-प्रकार को समाप्त करने में रोक लगाई हुई है। इसका उद्येश्य यही है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए पहाड़ियों को न छेड़ा जाए।

इस समय अलग-अलग राज्यों में, जो अरावली रेंज में आते हैं, उनके खनन के अलग-अलग नियम हैं। इसको देखते ही सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा था कि वह अरावली रेंज में खनन के लिए एक जैसे नियम बनाए। इसके बाद मंत्रालय ने अपने सचिव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। इसमें एफआरआई, सर्वे आफ इंडिया और जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के प्रमुखों के साथ अरावली रेंज के तीन राज्यों हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के पर्यावरण सचिव शामिल थे। इसी समिति ने नये नियम तय किए, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सहमति दी। नई परिभाषा के अनुसार-अरावली वह भू-आकृति है, जिसकी उूंचाई आस-पास की भूमि से कम से कम 100 मीटर अधिक हो और अरावली पर्वतमाला दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह है, जो एक दूसरे से 500 मीटर पर स्थित हो।

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अरावली क्षेत्र में खनन न करने की बात कही। क्योंकि इसका 58 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र है, 20 प्रतिशत संरक्षित वन क्षेत्र है और करीब 11 प्रतिशत बफर क्षेत्र है। वहीं 6-7 प्रतिशत भू-भाग पर लोग बसते हैं। साथ ही संरक्षित वन क्षेत्र में चार टाइगर रिजर्व, 20 वाइल्ड लाइफ सेंचुरी व ग्रीन एरिया मिशन के तहत पौधे रोपण वाले क्षेत्र हैं। अरावली पर्वतमाला को संरक्षित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार गंभीर दिख रही है, लेकिन अभी ऐसे भी इरादे हैं कि यहां व्यावसायिक हब तैयार किए जाएं। इसी प्रसंग में भू-माफियों से लेकर खनन माफिया सरकार की उदार नीति से अपना व्यवसाय करने से नहीं हिचक रहे हैं। वास्तव में यदि सरकार अरावली श्रृंखला को बचाने में गंभीर है, तो बहुत कुछ नये उपाय करने होंगे। तभी दिल्ली मेरी दिल्ली राजधानी बच पायेगी। प्रदूषण जिस ढ़ंग से लोगों को बीमार कर रहा है, उसके उपचार के लिए इन पहाड़ियों को गहन हरित करना होगा।

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