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अरावली रेंज पर सरकार की नई नीतिः कोई माइनिंग नहीं

Aravalli Range

Aravalli Range: केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि अरावली रेंज को पूरी तरह से माइनिंग मुक्त जोन के तौर पर रखा जाएगा। देर से आये दुरुस्त आए। काफी वाद-विवाद के बाद सरकार को स्वीकारना पड़ा कि माइनिंग अरावली रेंज के वातावरण को ध्वस्त करेगी। अब तक हुआ भी ऐसा ही है-दिल्ली अरावली रेंज पर ही बसी हुई है। राष्ट्पति भवन अरावली पहाड़ियों पर ही है। अरावली पर दो राष्ट्ीय दलों के वरिष्ठ नेता पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और कांग्रेस के पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बीच खनन से लेकर कई मुद्दों पर, अरावली के भविष्य पर विवाद होता रहा। एकदूसरे की टांग खिंचाई सिवाय किसी वैज्ञानिक आधार को नहीं देखा गया।

यह खबर कि खनन अरावली की पहाड़ियों पर नहीं होगा। यदि इस खबर पर विश्वास करें, तो रचनात्मक दृष्टि से इस कदम को सही माना जा सकता है। होना भी यही चाहिए। हमें इस भूमि को छेड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र मौसम के चक्र को नियंत्रित कर रहा है। इसकी जमीन की मिट्टी, चट्टानें संरक्षित रहनी चाहिए, क्योंकि वनस्पतियां, जंगल तभी बचे रहेंगे। प्रकृति अपने हिसाब से पर्यावरण को संरक्षित करने का प्रयास करती है। आदमी अपने हित के लिए माइनिंग या अन्य कामों से प्रकृति के साथ बलात्कार कर रहा है।

यही हिसाब अरावली पहाड़ियों के साथ चल रहा है। ध्यान देने की बात यह है कि जमीन के उूपर ही नहीं, जमीन के गर्भ की खुदाई को मरुस्थलों का विस्तार करना है। ऐसी ही छेड़-छाड़ होती रही, तो कच्छ-जैसे मरुस्थल इन पहाड़ियों को गिराने से हो जाएंगा। पर्यावरण मंत्री बड़े दावे से कह रहे हैं कि सर्वे आफ इंडिया से अरावली की भूमि का सर्वेक्षण करवायेंगे। यह तो ठीक है, पर इसके साथ मृदा यानी मिट्टी का परीक्षण भू वैज्ञानिक ही कर पायेंगे। पहाड़ों की बनने की प्रक्रिया और कौन-सी पर्वतों और जमीन की मिट्टी बनी, इस सबका अध्ययन भू-वैज्ञानिक ही कर पाते हैं।

इसलिए गंभीरता से विनाश की ओर जा रही भूमि को रोकने के लिए नेताओं को एक दूसरे पर आक्षेप से बच कर रेगिस्तान होती भूमि को बचाने का प्रयास करना चाहिए। भूमि के भीतर जल का संचयन तभी होगा, जब उस क्षेत्र में वर्षात होगी, यह तभी होगा, जब हरित क्रांति-जैसा कार्य जंगलों को पनपाने के लिए किया जाएगा; तब ही मौसम चक्र अपनी गति से गतिमान होकर पर्यावरण को बचाएगा। यह भी ध्यान देने की बात है कि विश्व में चिपको आंदोलन के कारण ही, दुनिया के देश पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आये। आज भी उन्हीं भावनाओं की जरूरत है, जिससे अरावली की श्रृंखला बच पायेगी, और इस क्षेत्र में रहने वाले प्राणी चैन की सांस ले पायेंगे।

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