Phalain Village Holi Rituals: ब्रज की होली दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन यहां के फालैन गांव की होली सबसे अलग और चौंकाने वाली मानी जाती है। यहां 45 दिनों तक चलने वाले होली उत्सव के बीच एक बेहद खास परंपरा निभाई जाती है। गांव में 20 फीट लंबी और 30 फीट चौड़ी होलिका जलाई जाती है। हैरानी की बात यह है कि धधकती आग की लपटों के बीच से एक पंडा दौड़ते हुए निकलता है और उसे कोई नुकसान नहीं होता। गांव के लोग मानते हैं कि यह परंपरा सतयुग के समय से चली आ रही है और लगभग 5300 साल पुरानी है।

फालैन गांव की अनोखी होली परंपरा
पंडा परिवार की 45 दिन की कठिन साधना
पंडा परिवार के सदस्य संजू भक्त प्रह्लाद मंदिर में पिछले 45 दिनों से व्रत और धार्मिक नियमों का पालन कर रहे हैं। इस दौरान वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और गांव के लोगों से भी मिलना-जुलना कम कर देते हैं। बसंत पंचमी से ही इस व्रत की तैयारी शुरू हो जाती है। व्रत के दौरान पंडा घर से अलग मंदिर में रहते हैं। दिन में सिर्फ एक बार फलाहार करते हैं और एक बार में हथेली में जितना पानी आ सके, उतना ही पीते हैं। वह जमीन पर बिस्तर लगाकर सोते हैं और गोवंश की पूंछ पकड़ने या चमड़े से बनी चीजों का इस्तेमाल करने से बचते हैं। उनका मानना है कि इस साधना से आत्मशक्ति बढ़ती है और आग की तपन महसूस होने के बावजूद शरीर नहीं जलता।
गांव का उत्सव जैसा माहौल और साफ-सफाई का अभियान
फालैन गांव की आबादी लगभग 10 हजार है और होली के मौके पर यहां बेहद उत्साह का माहौल रहता है। गांव को दिवाली की तरह सजाया जाता है। घरों की रंगाई-पुताई की जाती है और दरवाजों पर नया पेंट कराया जाता है। मंदिर और घरों को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। गांव के रहने वाले तुलसीराम ने बताया कि पंडा मेले के समय पूरे गांव को साफ-सुथरा रखा जाता है। चरण सिंह के अनुसार, यहां होली पर दिवाली जैसा माहौल बनता है। लोग अपने घरों को सजाते हैं और मेहमानों के लिए खास पकवान भी बनाए जाते हैं। गांव के प्रधान कैलाश ने प्रह्लाद कुंड की साफ-सफाई के लिए विशेष अभियान भी चलाया है।
Phalain Village Holi Rituals: फालैन गांव की दो सबसे खास पहचान
ग्रामीणों के अनुसार, यह गांव दो वजहों से बहुत प्रसिद्ध है। पहली पहचान यहां मौजूद भक्त प्रह्लाद के मंदिर की है और दूसरी पहचान होलिका दहन की रात धधकती आग के बीच से पंडा के सुरक्षित निकलने की परंपरा है। इस परंपरा को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी पर्यटक आते हैं। हर साल 50 हजार से ज्यादा लोग इस अनोखे आयोजन को देखने गांव पहुंचते हैं।

फालैन गांव की अनोखी होली परंपरा
जलती होलिका से निकलने की तैयारी और परंपरा
संजू पंडा इस बार दूसरी बार जलती होलिका की आग के बीच से निकलने वाले हैं। इससे पहले उनके भाई मोनू पंडा चार बार और उनके पिता सुशील आठ बार इस परंपरा को निभा चुके हैं। परिवार का कहना है कि उनका वंश सतयुग के समय से ही इस धार्मिक परंपरा को निभाता आ रहा है। गांव के लोग मानते हैं कि इसी स्थान पर भक्त प्रह्लाद को होलिका ने गोद में लेकर बैठाया था, लेकिन भगवान नारायण के भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ और होलिका जलकर राख हो गई।
6-6 घंटे माला जप करते हैं पंडा परिवार के सदस्य
मोनू पंडा ने बताया कि गांव के प्रह्लाद कुंड से एक माला मिलने की मान्यता है। कहा जाता है कि यह माला प्रह्लाद जी के गले में थी। पहले इस माला में सात बड़े मनके थे, जिनसे बाद में 108 मनकों की माला बनाई गई। कई पीढ़ियां इसी माला से जप करती हैं। पंडा परिवार के सदस्य दिन में दो बार लगभग 6-6 घंटे माला जप करते हैं। संजू पंडा सुबह और शाम दोनों समय माला जप करते हैं और मानसिक साधना करते हैं।
होलिका दहन से पहले शुरू होते हैं धार्मिक अनुष्ठान
सुशील पंडा ने बताया कि होलिका दहन से करीब 36 घंटे पहले धमार गायन शुरू किया जाता है। इसके बाद 24 घंटे पहले हवन की प्रक्रिया शुरू होती है। जब हवन की अग्नि धीमी होने लगती है, तभी होलिका जलाई जाती है। पंडा मंदिर से निकलकर पहले प्रह्लाद कुंड में स्नान करते हैं। फिर शरीर पर सिर्फ एक गीला गमछा पहनकर जलती होलिका के बीच से दौड़ते हुए लगभग 30 से 35 कदम पार कर जाते हैं।
Phalain Village Holi Rituals: 12 गांव की सामूहिक होली का आयोजन
प्रह्लाद कुंड के पास 12 गांवों की सामूहिक होली जलाई जाती है। इसमें फालैन, पैगांव, सुपाना, राजगढ़ी भीखगढ़ी, नगला मेव, महरौली, विशंभरा, रोहिता 3 बिसा, 7 बिसा, 10 बिसा और चौंकरवास गांव शामिल हैं। हर घर से उपले (सूखे गोबर के कंडे) इकट्ठा किए जाते हैं। गांव के प्रधान राजस्थान से झरबेरिया की लकड़ी भी मंगवाते हैं ताकि होलिका दहन किया जा सके।

फालैन गांव की अनोखी होली परंपरा
20 फीट ऊंची और भयानक लपटों वाली होलिका
चरण सिंह ने बताया कि गांव में बनने वाली होलिका लगभग 20 फीट ऊंची और 30 फीट व्यास की होती है। जब होलिका जलती है तो उसकी लपटें इतनी तेज होती हैं कि आसपास खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि यह सब भगवान नारायण और भक्त प्रह्लाद की कृपा से संभव हो पाता है।
होलिका पूजा की विशेष प्रक्रिया
परंपरा के अनुसार, पंडा पहले प्रह्लाद कुंड में स्नान करते हैं। इसके बाद उनकी बहन जलती हुई होलिका के चारों तरफ कलश से जल का अर्घ्य देती हैं। स्नान के बाद पंडा के शरीर पर केवल गीला गमछा रहता है। फिर वह जलती होलिका की आग के बीच से 30 से 35 कदम दौड़कर पार कर जाते हैं।
Phalain Village Holi Rituals: जमीन से प्रकट हुई थीं प्रह्लाद की प्रतिमाएं
ग्रामीणों का विश्वास है कि भक्त प्रह्लाद मंदिर में स्थापित प्रतिमाएं जमीन से स्वयं प्रकट हुई थीं। बताया जाता है कि बहुत समय पहले एक संत इस गांव में आए थे। उन्हें एक पेड़ के नीचे भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की प्रतिमाएं मिली थीं। संत ने ये प्रतिमाएं गांव के पंडा परिवार को दी थीं और कहा था कि इन्हें मंदिर में स्थापित कर पूजा करें। साथ ही हर साल होलिका दहन के समय परिवार का एक सदस्य जलती आग के बीच से जरूर निकले। माना जाता है कि आग उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
पंडा आग में क्यों नहीं जलता? क्या कहता है विज्ञान
पंडा परिवार का मानना है कि 45 दिनों के व्रत से उनकी आत्मशक्ति बढ़ जाती है। उन्हें लगता है कि भक्त प्रह्लाद की माला उन्हें आग से बचाती है। उनका कहना है कि आग के बीच दौड़ते समय शरीर गीला रहता है, इसलिए आग की गर्मी तो महसूस होती है, लेकिन शरीर जलता नहीं है।
वहीं, अजय त्यागी जैसे वैज्ञानिक विशेषज्ञों का कहना है कि फिजिक्स के नियमों के अनुसार ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि कोई व्यक्ति सामान्य स्थिति में धधकती आग के बीच से निकलकर सुरक्षित रह सके। उनका मानना है कि हो सकता है कि पंडा आग में जाने से पहले शरीर पर कोई खास चीज लगाते हों या फिर कोई अन्य तकनीक इस्तेमाल करते हों, क्योंकि विज्ञान में ऐसा कोई नियम नहीं है जो आग के बीच से सुरक्षित निकलने की गारंटी दे सके।
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