Cow: कांगड़ा से एक खबर आई कि कुत्तों के आश्रय स्थल में जिंदी गाय को परोस दिया। मामला गंभीर है! ऐसा नहीं होना चाहिए था। लेकिन आज ऐसी स्थिति पूरे हिमाचल से लेकर पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भी हो सकती है। जब से बूढ़ी गायों को सरकार ने मारने से रोका है, तब से ऐसी वृद्ध गायें आवारा हो गई हैं। बहुत से गायों के मालिकों को लगता है कि अब इनसे कोई फायदा नहीं है। इन्हें कहां रखा जाए! क्योंकि चारा देने से लेकर उनकी देखभाल करना गायों के मालिकों को दुविधा में डाल देता है; फिर उनके पास एक ही उपाय होता है कि उन्हें जंगलों में छोड़ दिया जाए। ऐसे बहुत सारे मामले हिमाचल में हैं। वहां के लोगों-किसान परेशान हो गए हैं। वह छोड़ी हुई गाएं जंगलों में रहकर जंगली हो गई हैं। अब उन्हें चारे की आवश्यकता होती, लेकिन जब चारा जंगलों में समाप्त होने लगता है, तब वह किसानों के खेतों में आकर लहलहाती फसलों को साफ कर रही हैं, गायों का स्वभाव जंगली हो गया है। किसान अब परेशान है, फसलों के नुकसान से उनके पास कोई चारा नहीं है। उन्हें खुला छोड़ने से उनकी लहलाती फसलें चौपट हो रही हैं।
इन गायों के अलावा और भी पालतू जानवर हैं, जिनको उनके मालिक खुला जंगलों में छोड़ रहे हैं। यह सब अब परेशानियों को जन्म दे रहे हैं। यह पालतू जानवर अब जंगली रूप में परेशानियों के कारक हो गए हैं।
ऐसी परिस्थितियों के समाधान के लिए सिर्फ सरकार ही कोई ऐसी व्यवस्था कर सकती, जिससे कोई सही उपाय सामने आए।
ऐसी परिस्थितियां उत्तराखंड में हो गई हैं, वहां भी पालतू जानवरों को खुला छोड दिया जा रहा है। वेसे ही किसानों की फसल को जंगली सुअर समाप्त कर रहे हैं। जिस खेत में किसान फसल बोता है, उस खेत की सुअर खुदाई कर नगां कर दे रहे हैं। जंगली जानवरों की सुरक्षा भी आवश्यक है, लेकिन किसान की फसल को भी सुरक्षित करने की कोशिश के उपाय भी सामने आने चाहिए।
लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल
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