IRCTC: भारतीय रेलवे की नई पहचान और देश की सबसे आधुनिक ट्रेनों में शुमार ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ अपनी गति, सुविधाओं और लजीज खान-पान के लिए यात्रियों की पहली पसंद बनी हुई है। विमान जैसी सुविधाओं का अनुभव देने वाली इस ट्रेन में यात्रियों को चांदी के वर्क जैसी चमक वाली पैकिंग में ‘गरमा-गरम’ रोटियां परोसी जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि आधुनिकता की इस चमक के पीछे आपकी सेहत के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है? दरअसल, जिस रोटी को आप ‘ताजा और गर्म’ समझकर खा रहे हैं, उसे गर्म करने का तरीका आपके शरीर में धीरे-धीरे जहर घोल रहा है।
कैसे गर्म हो रही है आपकी रोटी?
ट्रेनों में भोजन की आपूर्ति करने वाली कैटरिंग इकाइयां अक्सर समय बचाने और भोजन को लंबे समय तक गर्म रखने के लिए एक खतरनाक शॉर्टकट अपनाती हैं। यात्री जब रोटी की मांग करते हैं, तो उन्हें परोसने से पहले रोटियों को प्लास्टिक के सीलबंद पैकेटों (Plastic Pouches) में ही ओवन या हॉट-केस में डाल दिया जाता है। अत्यधिक तापमान पर जब प्लास्टिक गर्म होता है, तो वह पिघलता तो नहीं, लेकिन सूक्ष्म स्तर पर अपने भीतर छिपे घातक रसायनों को भोजन में छोड़ देता है। यह प्रक्रिया इतनी खामोश होती है कि आपको स्वाद में कोई अंतर पता नहीं चलता, लेकिन रोटी का हर निवाला रसायनों से लथपथ हो चुका होता है।
IRCTC: शरीर में पहुँच रहे टॉक्सिन्स
विज्ञान कहता है कि प्लास्टिक को गर्म करना कभी भी सुरक्षित नहीं होता। जब वंदे भारत जैसे कोचों में प्लास्टिक पैकेट में रोटियां गर्म की जाती हैं, तो निम्नलिखित घातक रसायन आपके भोजन का हिस्सा बन जाते हैं:
* बिस्फेनॉल-ए (BPA): यह प्लास्टिक का सबसे खतरनाक घटक है। जब यह शरीर में पहुँचता है, तो शरीर के हार्मोन्स को असंतुलित कर देता है। यह सीधा हमारे एंडोक्राइन सिस्टम पर हमला करता है।
* थैलेट्स (Phthalates): प्लास्टिक को लचीला बनाने वाले ये रसायन गर्म होने पर भोजन में ‘लीच’ (रच-बस) जाते हैं। इससे प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है और लिवर को नुकसान पहुँचता है।
* माइक्रोप्लास्टिक्स: गर्म वातावरण में प्लास्टिक की ऊपरी परत टूटने लगती है और बारीक कण खाने में मिल जाते हैं, जो रक्त प्रवाह के जरिए हृदय और मस्तिष्क तक पहुँच सकते हैं।
लंबे समय तक प्लास्टिक में गर्म किया हुआ भोजन खाना किसी बड़े खतरे को दावत देने जैसा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसके परिणाम अत्यंत डरावने हो सकते हैं:
* कैंसर का जोखिम: प्लास्टिक के रसायनों को ‘कार्सिनोजेनिक’ माना जाता है, जो शरीर में कैंसर कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं।
* मेटाबॉलिज्म में खराबी: यह धीमा जहर मोटापे, मधुमेह और थायराइड जैसी समस्याओं को जन्म देता है।
* बच्चों के लिए घातक: यदि बच्चे इस तरह के भोजन का सेवन नियमित रूप से करते हैं, तो उनके शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा आ सकती है।
IRCTC के दावे बनाम जमीनी हकीकत
भारतीय रेलवे खान-पान एवं पर्यटन निगम (IRCTC) हमेशा से ‘फूड ग्रेड’ प्लास्टिक के इस्तेमाल का दावा करता रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ‘फूड ग्रेड’ होने का मतलब उसे गर्म करना भी सुरक्षित है? विशेषज्ञों का मानना है कि ‘फूड ग्रेड’ केवल भोजन रखने के लिए होता है, उसे उच्च तापमान पर गर्म करने के लिए नहीं। वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेन, जिसमें यात्री काफी महंगा किराया और कैटरिंग शुल्क देते हैं, वहाँ एल्युमीनियम फॉयल या बटर पेपर के बजाय प्लास्टिक का उपयोग करना सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से समझौता है। एक जागरूक यात्री के तौर पर आपको अपनी सेहत के प्रति सजग रहना होगा…
* निरीक्षण करें: भोजन आने पर पैकेट को छूकर देखें, यदि वह अत्यधिक गर्म है और प्लास्टिक के अंदर भाप बनी हुई है, तो तुरंत समझ जाएं कि इसे प्लास्टिक सहित गर्म किया गया है।
* शिकायत दर्ज करें: रेल मदद (RailMadad) ऐप, ट्विटर (X) और ऑन-बोर्ड स्टाफ से इसकी लिखित शिकायत करें।
* विकल्प चुनें: यदि संभव हो, तो प्लास्टिक में लिपटी गर्म रोटियों के सेवन से बचें और प्रशासन पर दबाव बनाएं कि वे ‘इको-फ्रेंडली’ पैकिंग का उपयोग करें।
Report BY: संजय कुमार
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