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क्या सच में महाशिवरात्रि की रात ही हुआ था शिव-पार्वती का दिव्य विवाह? या इसके पीछे छुपी है कोई और रहस्यमयी कहानी

क्या सच में महाशिवरात्रि की रात ही हुआ था शिव-पार्वती का दिव्य विवाह? या इसके पीछे छुपी है कोई और रहस्यमयी कहानी

Maha Shivaratri: फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि रात का गहरा सन्नाटा मंदिरों में गूंजता ॐ नमः शिवाय  और लाखों दीपों की रौशनी में जागती हुई आस्था। यही है महाशिवरात्रि की वह अलौकिक रात, जिसे लेकर सदियों से एक प्रश्न बार-बार उठता रहा है क्या सचमुच इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था? भारत के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को अलग रूप में देखा जाता है। कहीं इसे शिव-विवाह की रात कहा जाता है, तो कहीं इसे शिव के अनंत ज्योतिर्लिंग स्वरूप के प्राकट्य का दिवस माना जाता है। लेकिन इन मान्यताओं के पीछे छिपी कथा अत्यंत गहरी, भावनात्मक और रहस्यमयी है।

 सती का त्याग और शिव का मौन

कहानी की शुरुआत होती है माता सती से, जो प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। दक्ष को शिव का साधारण वेश और तपस्वी जीवन स्वीकार नहीं था। उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उसमें शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया।अपमान की अग्नि में जलती हुई सती ने यज्ञ स्थल पर ही स्वयं को समर्पित कर दिया। यह घटना केवल एक परिवार का विवाद नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांड की दिशा बदल देने वाला क्षण था। शिव शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठे। उन्होंने सती के शरीर को कंधे पर उठाया और तांडव करने लगे। ब्रह्मांड डगमगाने लगा।इसके बाद शिव ने संसार से दूरी बना ली। वे हिमालय की गुफाओं में गहन समाधि में लीन हो गए। सृष्टि जैसे थम सी गई।

Maha Shivaratri: पार्वती का जन्म और अदम्य संकल्प

समय बीता। सती ने हिमालयराज और माता मेना के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती को ज्ञात था कि उनका भाग्य शिव से जुड़ा है। लेकिन इस बार उन्हें शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करनी थी।
पार्वती ने वर्षों तक कठिन साधना की। कभी केवल फलाहार, कभी केवल पत्तों पर जीवन, और अंत में अन्न-जल तक त्याग दिया। उनका यह तप इतना प्रबल था कि देवताओं को भी हस्तक्षेप करना पड़ा।

Maha Shivaratri: तारकासुर का आतंक और देवताओं की चिंता

उधर तारकासुर नामक राक्षस अत्याचार फैला रहा था। उसे वरदान मिला था कि उसका वध केवल शिवपुत्र ही कर सकता है। लेकिन शिव तो समाधि में लीन थे और विवाह का कोई संकेत नहीं था।देवताओं ने कामदेव को भेजा, ताकि वे शिव की समाधि भंग करें। कामदेव ने पुष्पबाण चलाया, किंतु परिणाम अप्रत्याशित था। शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए। यह घटना बताती है कि शिव केवल तप और वैराग्य के प्रतीक नहीं, बल्कि अपार शक्ति के भी स्वरूप हैं।

तपस्या का फल और विवाह का निर्णय

पार्वती की अटूट भक्ति और समर्पण अंततः शिव के हृदय को स्पर्श कर गए। उन्होंने पार्वती को स्वीकार किया। देवताओं में हर्ष फैल गया। हिमालय में विवाह की तैयारी शुरू हुई।लोककथाओं और कई पुराणों में वर्णन मिलता है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। शिव की बारात अद्भुत थी भूत, प्रेत, गण और देवताओं का अनोखा संगम। पार्वती पक्ष ने पहले इस विचित्र बारात को देखकर संकोच किया, लेकिन अंततः दिव्य विवाह संपन्न हुआ। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में महाशिवरात्रि के दिन शिव-बारात निकाली जाती है और विवाह की झांकी सजाई जाती है।

Maha Shivaratri: एक और मान्यता: शिव का अनंत ज्योतिर्लिंग

कुछ ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि इसी रात ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तभी एक अनंत ज्योति-स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका आदि और अंत किसी को ज्ञात नहीं था। वही शिव का निराकार स्वरूप था।
इस कथा के अनुसार महाशिवरात्रि शिव के लिंग रूप में प्राकट्य का दिवस है। इसलिए इस रात शिवलिंग पर विशेष अभिषेक किया जाता है।

क्यों है यह रात इतनी विशेष?

महाशिवरात्रि को “महान रात्रि” कहा जाता है क्योंकि यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि चेतना के जागरण का प्रतीक है। मान्यता है कि इस रात ब्रह्मांडीय ऊर्जा विशेष रूप से सक्रिय होती है। रात्रि जागरण, मंत्र जाप और ध्यान का विशेष महत्व माना जाता है।देशभर के मंदिरों में पूरी रात पूजा होती है। भक्त चार प्रहर में अभिषेक करते हैं जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं।

Maha Shivaratri: तो क्या सच में इसी दिन हुआ था विवाह?

धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं के अनुसार हाँ, महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह की रात माना जाता है। हालांकि शास्त्रों में इसे शिव के दिव्य प्राकट्य की रात भी कहा गया है।अर्थात, यह पर्व एक ही समय में प्रेम, तपस्या, शक्ति और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है।महाशिवरात्रि की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और धैर्य से असंभव भी संभव हो जाता है। पार्वती का संकल्प, शिव का वैराग्य और अंततः उनका मिलन यह केवल देवकथा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश है।जब फाल्गुन की वह रात आती है और मंदिरों में घंटियां बजती हैं, तो लगता है मानो हिमालय की वादियों में फिर से वह दिव्य विवाह संपन्न हो रहा हो… और संसार एक बार फिर शिव-शक्ति के मिलन का साक्षी बन रहा हो।

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