NEW DELHI: देश की संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठ रहे राजनीतिक सवालों के बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने कहा है कि लोकतांत्रिक ढांचे को बार-बार कटघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग, सेना और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं पर अविश्वास जताना न केवल संस्थागत मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि यह आम नागरिकों में गलत संदेश भी देता है।
वे कोई ठोस तथ्य सामने नहीं रख पाए
आईएएनएस से बातचीत में विक्रम सिंह ने कहा कि 272 से अधिक रिटायर्ड जजों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र को वरिष्ठ नागरिकों का स्वाभाविक आक्रोश बताया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संस्थाओं पर आरोप लगाने वालों को जब अपने दावों को शपथ पत्र के माध्यम से प्रमाणित करने का अवसर दिया गया, तब वे कोई ठोस तथ्य सामने नहीं रख पाए।
NEW DELHI: विभाजन या चरमपंथी लोकतंत्र को कमजोर
विक्रम सिंह के अनुसार, “अगर किसी के आरोपों में दम होता, तो वे शपथ पत्र देकर अपनी बात को मजबूत बनाते। केवल आरोप लगाने से विश्वास नहीं बनता। देश अब निरर्थक बयानबाज़ी से थक चुका है।” उन्होंने राजनीतिक दलों को नसीहत देते हुए कहा कि जमीनी काम, लोगों के दुःख-दर्द और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। समाज में जातिगत विभाजन या चरमपंथी अवज्ञान को बढ़ाने वाली टिप्पणियाँ लोकतंत्र को कमजोर करती हैं।
NEW DELHI: चुनाव आयोग को जाति या समुदाय के दायरे में बांधकर
पूर्व डीजीपी ने कहा कि सेना, न्यायपालिका और चुनाव आयोग को जाति या समुदाय के दायरे में बांधकर देखना गलत है। “ये संस्थाएँ राष्ट्र की धरोहर हैं और इन पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है,” उन्होंने कहा। इससे पहले जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद ने भी विपक्ष को संस्थागत संवाद की मर्यादा बनाए रखने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि विपक्ष मजबूत होना चाहिए, लेकिन सुरक्षा बलों और संवैधानिक ढांचे पर लगातार हमले उचित नहीं हैं।
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