Parliament News: राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के अंश हटाए जाने का मामला संसद में बड़ा सियासी विवाद बन गया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिए गए उनके भाषण के महत्वपूर्ण हिस्से राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट से हटाए जाने पर खड़गे ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई और इसे लोकतांत्रिक परंपराओं व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया।
तथ्यात्मक आलोचना भी असहज?
खड़गे ने सदन में कहा कि हटाए गए अंशों में मुख्य रूप से वे हिस्से थे, जिनमें उन्होंने मौजूदा सरकार के कार्यकाल में संसदीय कामकाज की स्थिति और कुछ नीतियों पर तथ्य आधारित आलोचना की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके वक्तव्य पूरी तरह नियमों के दायरे में थे और किसी भी प्रकार के असंसदीय या मानहानिकारक शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया।
Parliament News: नियमों और संविधान का हवाला
खड़गे ने नियम 261 और संविधान के अनुच्छेद 105 का उल्लेख करते हुए कहा कि सांसदों को सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में भाषण के बड़े हिस्से को हटाना न केवल संसदीय परंपराओं पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करता है। उन्होंने सभापति से हटाए गए अंशों को रिकॉर्ड में बहाल करने की मांग की।
सरकार का बचाव, पीठ की आड़
सरकार की ओर से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कार्यवाही से किसी अंश को हटाना पूरी तरह सभापति का अधिकार है। उन्होंने कहा कि यदि सभापति ने अपने विवेक से नियमों के तहत निर्णय लिया है, तो उस पर सवाल उठाना उचित नहीं है। उनका कहना था कि नेता प्रतिपक्ष अपने आकलन को अंतिम सत्य मानकर पीठ के निर्णय पर प्रश्न नहीं खड़े कर सकते।
Parliament News: सभापति की कड़ी प्रतिक्रिया
सभापति सी पी राधाकृष्णन ने भी खड़गे की बातों से असहमति जताते हुए कहा कि पीठ को निर्देश देना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इसे “सरासर गलत” करार दिया।
Parliament News: विपक्ष का आरोप: असहमति की आवाज दबाई जा रही
खड़गे ने जवाब में कहा कि वे केवल अपनी पीड़ा और आपत्ति रख रहे हैं, जो एक सांसद के तौर पर उनका अधिकार है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सदन के भीतर न्याय नहीं मिला, तो वे अपने भाषण का अनरिकॉर्डेड संस्करण जनता के सामने रखने को मजबूर होंगे।
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