Pending Cases in Indian Judiciary: अदालतों में वर्षों से मुकदमें लंबित पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और निचली अदालतों में कुल मिलाकर 5 करोड़ 49 लाख मुकदमें चल रहे हैं, जो वर्षों से फैसले की राह देख रहे है। कुछ मुकदमें दशकों से चल रहे हैं। इन मामलों के बढ़ने के बहुत सारे कारण हैं- जैसे जजों की कमी। इसके अलावा किस तरह से मुकदमों के निपटान की प्रक्रिया अपनाई जाए, उसमें कमी।
लंबित मुकदमें दिसंबर 2025 तक देश की सभी अदालतों में इस तरह से थे–
सुप्रीम कोर्ट में लगभग 90 हजार से 91 हजार तक।
हाई कोर्ट में 63 लाख से ज्यादा मामले हैं।
निचली अदालतो में लगभग 4 करोड़ 80 लाख मुकदमें लंबित हैं।
यह सर्वविदित है कि देश की आबादी के हिसाब से अदालतों की प्रक्रिया को कहीं से ठीक नहीं किया गया। न्यायालयों की कमी तो है, पर जजों की संख्या भी नहीं बढ़ाई गयी है। साथ ही केस निपटाने के लिए जो प्रक्रिया होती है, वह बहुत ही ढ़ीली है। एक मुकदमा, जो छह महीने मे ही निपटाया जा सकता था, उसको निपटाने में वर्षों लग जाते हैं। किसी भी केस को उठा कर देख लीजिए, तो मिलेगा जजों की डेट पर डेट देने की प्रक्रिया। इस प्रक्रिया को ढ़ीला करने में वकीलों की भूमिका मुख्य है। वह अपनी सुविधा को तो देखते है, पर जो शीघ्र न्याय चाहता है, उसको मौका ही नहीं दिया जाता। बहुत सारे मुकदमें इन्हीं कारणों से लटके पड़े हैं। न्यायाधीश से लेकर वकीलों तक का रुख मुकदमें को निपटाने का नहीं होता। किसी भी केस को देख लें, तो यही बात सामने आयेगी कि बिला वजह डेट पर डेट ली जाती है। उस स्थिति में बेचारा गरीब कुछ नही ंकर सकता। जानबूझकर जटिल प्रक्रिया बना दी जाती है, जबकि कम समय में आप केस का निपटारा कर कर सकते थे।
अदालतों का ढ़ांचा भी न्याय के कार्य को ढ़ीला कर देता है। बहुत सारी अदालतों में आपको कमियां दिख सकती है। स्टाफ की कमी भी एक कारण है।
कभी- कभी तो जजों के पद खाली पड़े होते हैं। उन पदों को भरने में ढ़ीलापन भी दिखता है। मामलों की जटिलता एक बड़ा कारण भी है। लेकिन उसे आसान करने के लिए मशीनरी को दुरुस्त करने की भी जरूरत होती है। अक्सर चलने दो कहकर ढ़िलाई बढ़ती जाती है। और इस कारण ढ़ेरों वाद अपनी जगह से आगे खिसक नहीं सकते।
नागरिको को न्याय मिलने मे देरी आम बात हो गई है। अक्सर लोग अदालतों की दशा देखकर निराश हो जाते हैं। कोर्ट में कुछ वाद तो पीढ़ियों से न्याय की अपेक्षा कर जीवन ही गवां चुके होते हैं। फिर भी फैसला नहीं हो पाता। भ्रष्टाचार भी न्याय प्रणाली को बदनाम कर रहा है। न्याय देने में विलंब करने की वजहों में से भ्रष्टाचार एक वजह भी है। मध्यस्थता पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा है- वह ऐसे कई दरवाजों वाले न्यायालय की कल्पना करते हैं, जहां न्यायालय विवाद समाधान का एक व्यापक केंद्र हो, न कि सिर्फ मुकदमें का स्थान। मध्यस्थता त्वरित निपटान का तरीका है।
सीजेआई बार कांउसिल आफ इंडिया के गोवा सम्मेलन में मध्यस्थता पर विचार व्यक्त कर रहे थे। इसी प्रसंग में वह आगे कहते हैं-देशभर में वकीलों को प्रशिक्षित करने के लिए देश के स्तर पर कानूनी अकादमी की जरूरत है, ताकि वे एआइ यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर अपराधों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर सकें। आगे कहते हैं-हम ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं, जहां एआइ कानूनी प्लेटफार्म के लिए शक्तिशाली उपकरण बनता जा रहा है, पर तकनीक हमें विभिन्न प्रकार के अपराधों की ओर भी ले जा रही है। मध्यस्थता की सफलता मध्यस्थ की क्षमता में निहित है, जो न सिर्फ स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा, बल्कि उस व्यक्ति की बोलचाल, अभिव्यक्तियों व सांस्कृतिक मुहावरों को भी समझता हो, जिसके लिए मध्यस्थता की जा रही है। वर्तमान में 39 हजार प्रशिक्षित मध्यस्थ हैं, पर मांग और आपूर्ति में अंतर है। वे मानते हैं, सभी स्तरों पर मध्यस्थता के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए देश को ढ़ाई लाख से अधिक प्रशिक्षित मध्यस्थों की जरूरत है। जिला सेे लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक मध्यस्थों की संख्या को बढ़ाने की जरूरत है। न्यायिक लंबित मामलों को कम कर सकने वाली मध्यस्थता कानून की कमजोरी का प्रतीक नहीं है, बल्कि उसका उच्चतम विकास है। सीजेआइ मानते हैं – हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कुछ मामले ऐसे होंगे, जिन्हें मध्यस्थता या मध्यस्थता के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता। इसलिए, न्यायिक प्रणाली हमेशा उन विवादों के लिए निष्पक्ष मुकदमें के परीक्षण के लिए तैयार होगी।
हमें भी उच्च न्यायालय में मध्यस्थता को लेकर एक अनुभव हुआ, लेकिन उस मध्यस्थता वाली प्रक्रिया ने हमें संतोष का लाभ नहीं दिया। कहीं न कहीं मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति की क्षमता से संतुष्टि नहीं मिली। लेकिन भारतीय न्यायालयों से हमें अपेक्षा है कि वह न्याय प्रक्रिया को रोके नहीं, उसे गतिमान करे, ताकि न्याय मिलने का हमें अहसास हो।
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