PRASHANT KISHORE: बिहार के ऐतिहासिक चुनाव परिणामों ने जहां एनडीए की झोली सीटों से भर दी, वहीं महागठबंधन का लगभग सफाया हो गया। लेकिन इस पूरे चुनावी नतीजे का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु रहा — ‘पीके’ यानी प्रशांत किशोर। तीन साल की मेहनत और हजारों किलोमीटर की पदयात्रा के बाद भी जनसुराज पार्टी शून्य पर सिमटती दिखी।
पीके: तीन साल की मेहनत और 0 का परिणाम
PRASHANT KISHORE: प्रशांत किशोर ने बिहार को बदलाव का सपना दिखाया, लेकिन जनता ने उनके सपने को सिरे से नकार दिया। जनसुराज पार्टी के 98% उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। पीके जिस आत्मविश्वास के साथ चुनाव मैदान में उतरे थे, वह नतीजों के बाद टूटा हुआ नजर आया। उन्होंने कहा था कि या तो उनकी पार्टी 150+ सीटें जीतेगी या 10 से भी कम। नतीजा, 10 भी नहीं, सीधा शून्य।
पीके की भविष्यवाणी गलत, जनता का मूड अलग
PRASHANT KISHORE: चुनाव से पहले पीके ने दावा किया था कि जेडीयू 25 से ज्यादा सीट नहीं ला पाएगी। लेकिन नतीजों ने पीके के सभी अनुमान उलट दिए। बिहार की जनता ने स्पष्ट संदेश दिया—बदलाव के दावों से ज्यादा उन्हें भरोसा अनुभव और मजबूत सामाजिक समीकरणों पर है।
जनता के बीच आवाज क्यों नहीं बनी?
PRASHANT KISHORE: पीके तेजस्वी को चुनौती देने के बाद राघोपुर से चुनाव नहीं लड़े।इससे जनता को लगा कि उनकी राजनीति व्यवसाय जैसी है। जाति और धर्म की राजनीति से दूरी के दावों के बाद भी टिकट वितरण में वही पुराना फार्मूला अपनाया। शराबबंदी का विरोध करने से महिला मतदाता उनसे दूर हो गईं। बिहार की जटिल जातीय-सामाजिक संरचना को पीके समझ नहीं पाए।
ओवैसी की बल्ले-बल्ले
PRASHANT KISHORE: तेजस्वी यादव ने एआईएमआईएम को 6 सीटें देने से इनकार किया था। आज चुनाव में उन्हीं 6 सीमांचल सीटों पर ओवैसी की पार्टी मजबूत बढ़त में है। ओवैसी ने पिछले चुनाव में राजद द्वारा 4 विधायकों को तोड़े जाने का बदला ले लिया।
बसपा ने रामगढ़ में मारी बाजी
PRASHANT KISHORE: बिहार की रामगढ़ सीट पर बसपा ने राजद और भाजपा को पछाड़ दिया। यह मायावती के लिए चुनावी राहत की खबर साबित हुई।
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