rahul gandhi: कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संभावित अयोध्या दौरे और राम मंदिर दर्शन को लेकर अयोध्या के साधु-संतों और महंतों की कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। संत समाज ने राहुल गांधी के पूर्व बयानों और कांग्रेस की नीतियों का हवाला देते हुए उनके इरादों पर सवाल उठाए हैं और इसे राजनीतिक मजबूरी बताया है।
हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास का तीखा बयान
हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत राजू दास ने कहा कि जो व्यक्ति हिंदुओं को हिंसक बताता रहा हो, युवाओं पर मंदिर जाने को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करता हो और जिसकी पार्टी ने राम मंदिर के विरोध में अदालत में वकील खड़े किए हों, ऐसे लोग अगर आज राम मंदिर आते हैं तो सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहते हुए यही लोग सनातन संस्कृति पर प्रहार करते हैं और अब राजनीति के लिए राम का सहारा ले रहे हैं।
rahul gandhi: देवेशाचार्य महाराज बोले– देर से सही, राम की शरण में आए
हनुमानगढ़ी के देवेशाचार्य महाराज ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर राहुल गांधी रामलला के दर्शन के लिए आते हैं तो यह स्वागत योग्य है। देर से ही सही, राम की शरण में आने से कल्याण होगा। उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दलों को भगवान राम के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।
महामंडलेश्वर विष्णु दास ने उठाए इरादों पर सवाल
महामंडलेश्वर विष्णु दास ने कहा कि राहुल गांधी पहले भगवान राम और उनके अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे हैं। अब अचानक राम मंदिर आने की इच्छा यह दिखाती है कि उनका रुख वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। उन्होंने कहा कि यह दौरा श्रद्धा नहीं, बल्कि राजनीति से प्रेरित नजर आता है।
rahul gandhi: सीताराम दास महाराज का सबसे कड़ा हमला
सीताराम दास महाराज ने राहुल गांधी पर सबसे तीखा हमला करते हुए कहा कि उनके डीएनए में ही सनातन विरोध है। उन्होंने राहुल गांधी को “शुद्ध कालनेमि” बताते हुए कहा कि वे समय-समय पर गिरगिट की तरह अपना रूप बदलते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि राम प्राण प्रतिष्ठा में वे क्यों नहीं आए और राम सेतु व भगवान राम को काल्पनिक बताने वाले अब दर्शन के लिए क्यों आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसे लोगों को सनातन समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा।
संत समाज में असंतोष, राजनीति बनाम आस्था की बहस तेज
संतों के इन बयानों से साफ है कि राहुल गांधी का अयोध्या दौरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। एक ओर कुछ संत इसे आत्ममंथन का अवसर मान रहे हैं, तो वहीं अधिकांश संत इसे आगामी चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं।
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