Supreme Court: सुप्रीमकोर्ट ने संकेत दिया है कि अदालतों को अवमानना के अधिकार का प्रयोग करते समय यह ध्यान विशेष रूप से रखना चाहिए कि यह शक्ति न तो न्यायधीशों के लिए व्यक्तिगत कवच है और न ही आलोचना को चुप कराने के लिए हथियार है।
यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने एक महिला पर बांबे हाईकोर्ट द्वारा एक सप्ताह की सजा सुनाए जाने के मामले को लेकर है, जो स्वतः संज्ञान अवमानना मामले से संबधित था। कोर्ट ने कहा कि दया न्याययिक विवेक का एक अभिन्न हिस्सा रहना चाहिए, जिसे तब बढ़ाया जाना चाहिए, जब अवमानना करने वाला अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार करता है और इसके लिए प्रायश्चित करना चाहता है। दंड देने की शक्ति में स्वाभाविक रूप से क्षमा करने की शक्ति भी निहित होती है, जब अदालत के समक्ष उपस्थित व्यक्ति अपने कार्य के लिए वास्तविक पछतावा और पश्चाताप स्वीकार करता है। पीठ ने कहा, इसलिए अवमानना के अधिकार का प्रयोग करते समय, अदालतों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह शक्ति न तो न्यायधीशों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा/कवच है और न ही आलोचना को चुप करने का हथियार है।
यह आखिरकार अपनी गलती के लिए पछतावा स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। और गलती करने वाले को क्षमा करने के लिए और भी बड़े गुण की आवश्यकता होती है। पीठ ने हाई कोर्ट के 23 अप्रैल के आदेश के खिलाफ अपील पर अपना निर्णय सुनाया, जिसमें अपीलकर्ता को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया था। हाई कोर्ट ने उसे एक सप्ताह की साधारण कारावास की सजा सुनाई और उस पर 2000 रुपये का जुर्माना सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया कि अपीलकर्ता एक पूर्व निदेशक थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह संज्ञान लेकर बहुत सारे अदालतों के न्यायाधीशों की उस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की, जहां न्यायधीश अपने को सर्वोच्च मानकर चलते हैं। जबकि वे भी सामान्य रूप से इसी समाज से चुनकर उस प्रतिष्ठित पद पर आये हैं। जैसी मर्यादा उनकी है, वैसी ही मर्यादा देश के आम नागरिक की है। उसका भी सम्मान होना चाहिए।
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