जेजे हॉस्पिटल को गर्भपात कराने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के Sir JJ Hospital को निर्देश दिया कि सभी आवश्यक सावधानियों के साथ मेडिकल टर्मिनेशन की प्रक्रिया पूरी की जाए। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया था कि यदि गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रहती है तो मां और बच्चे की जान को तत्काल कोई खतरा नहीं है। इसके बावजूद अदालत ने माना कि अंतिम निर्णय मां की इच्छा और उसके शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार पर निर्भर करता है।
Supreme court on pregnency: 24 हफ्ते तक अनुमति, तो 30 हफ्ते में क्यों नहीं?
पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब 24 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है, तो 30 हफ्ते के मामले में पूर्ण प्रतिबंध क्यों लगाया जाए? अदालत ने माना कि कई बार महिला को निर्णय लेने में समय लग सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यदि अदालतें ऐसे मामलों में अनुमति देने से इनकार करती हैं, तो महिलाएं असुरक्षित और गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेने के लिए मजबूर हो सकती हैं, जो उनके जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
Supreme court on pregnency: नाबालिग की इच्छा पर हावी नहीं
महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी थी कि बच्चे के जन्म के बाद उसे अनाथालय में रखा जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विकल्प नाबालिग की इच्छा से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश का ऑपरेटिव हिस्सा तत्काल प्रभाव से लागू होगा, जबकि विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा। इस फैसले को महिलाओं के प्रजनन अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
यह भी पढे़ : ‘परीक्षा पे चर्चा’ के 9वें एडिशन में छात्रों से रूबरू हुए प्रधानमंत्री







