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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, धर्म परिवर्तन के बाद SC/ST का अधिकार नहीं रहेगा

सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति के अनुसूचित जाति दर्जे को खत्म कर दिया। हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने पर व्यक्ति एससी/एसटी अधिनियम के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।
धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Supreme Court On SC\ST:  सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति के दर्जे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले लोगों को ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा मिल सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन धर्मों को छोड़कर ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण भी नहीं मिलेगा।

यह फैसला जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारी की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति को अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसलिए यदि कोई दलित व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाले लाभों का दावा नहीं कर सकेगा।

ईसाई धर्म अपनाने पर खत्म होगा SC दर्जा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित हो जाता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। ऐसे व्यक्ति को SC/ST Act, 1989 के तहत संरक्षण भी नहीं मिल सकता। अदालत ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और उसका पालन कर रहा है, वह अनुसूचित जाति समुदाय का हिस्सा नहीं रह सकता।

यह फैसला पादरी चिंथदा आनंद द्वारा आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के निर्णय के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया गया।

Supreme Court On SC\ST:  धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Supreme Court On SC\ST: क्या है पूरा मामला

पादरी चिंथदा आनंद ने आरोप लगाया था कि अक्काला रामिरेड्डी और कुछ अन्य लोगों ने उनके साथ जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार किया। उन्होंने इस मामले में SC/ST अत्याचार अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली थी।

इसके बाद रामिरेड्डी ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एन. हरिनाथ ने एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पादरी आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए वे अब अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं माने जा सकते और SC/ST एक्ट के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकते।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि उनके पास अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र है, तब भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अदालत के अनुसार, ईसाई धर्म में जाति आधारित भेदभाव की व्यवस्था नहीं मानी जाती, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद उनका अनुसूचित जाति का दर्जा मान्य नहीं रहेगा। इसके बाद पादरी आनंद ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

धर्म परिवर्तन के बाद SC दर्जा नहीं रहेगा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में फिर से स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। यानी किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है।

SC/ST एक्ट के तहत संरक्षण नहीं मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि अपीलकर्ता लगभग 10 साल से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे और पादरी के रूप में रविवार की प्रार्थना भी कराते थे। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य मानना और उन्हें SC/ST अत्याचार अधिनियम के तहत संरक्षण देना उचित नहीं होगा।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि धर्म परिवर्तन करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा और उससे जुड़े कानूनी लाभ समाप्त हो जाते हैं।

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