Usa: अमेरिका खुद एक सुपरपावर है, लेकिन उसकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है जब उसके साथ NATO के 32 देशों का गठबंधन खड़ा होता है। अब तक जब भी अमेरिका किसी युद्ध में उतरा, तो ज्यादातर मौकों पर नाटो देश भी उसके साथ खड़े नजर आए। इसका मतलब यह होता था कि अमेरिका की लड़ाई में इन देशों को भी अपने सैनिक और संसाधन लगाने पड़ते थे। बदले में उन्हें मजबूत सुरक्षा की गारंटी मिलती थी और दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन का हिस्सा होने का फायदा भी मिलता था। लेकिन समय के साथ हालात बदलने लगे हैं और अब नाटो के भीतर भी अमेरिका को लेकर असहजता दिखने लगी है।
अमेरिका से दूर होता गया नाटो
डोनाल्ड ट्रंप के पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद ही नाटो देशों के साथ उनके मतभेद सामने आने लगे थे। ट्रंप का मानना था कि नाटो में शामिल कई देश रक्षा खर्च में पर्याप्त योगदान नहीं देते और अमेरिका पर ही निर्भर रहते हैं। हालांकि, उनके कार्यकाल के बाद जब जो बाइडेन राष्ट्रपति बने तो उन्होंने नाटो सहयोगियों के साथ रिश्तों को फिर से सामान्य करने की कोशिश की और हालात काफी हद तक पहले जैसे हो गए। लेकिन ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद एक बार फिर तनाव बढ़ गया। इस बार ट्रंप का रुख और सख्त नजर आ रहा है। उनके साथ-साथ उपराष्ट्रपति, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री भी नाटो देशों के साथ बैठकों में खुलकर नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। यूक्रेन को समर्थन देने में नाटो देश अमेरिका के कहने पर आगे आए थे, लेकिन बाद में अमेरिका का रुख बदलता दिखा। इसके अलावा ट्रंप ने टैरिफ लगाने के मामले में भी कई नाटो सहयोगियों को नहीं बख्शा। इतना ही नहीं, ट्रंप ने यह भी कहा कि अफगानिस्तान और इराक युद्ध के दौरान नाटो सहयोगियों ने अमेरिका की अपेक्षा के मुताबिक मदद नहीं की थी। हाल ही में वेनेजुएला और ईरान को लेकर हुए सैन्य कदमों में भी अमेरिका ने नाटो देशों से ज्यादा चर्चा नहीं की।
Usa: अब अमेरिका पर भरोसा नहीं, खुद की तैयारी
इन घटनाओं के बाद नाटो के कई सहयोगी देशों में अमेरिका को लेकर अविश्वास बढ़ता नजर आ रहा है। यही वजह है कि अब यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहते। फ्रांस और जर्मनी इस दिशा में नेतृत्व करने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन और कनाडा जैसे देश भी कई मुद्दों पर अमेरिका से अलग रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा कई यूरोपीय देश अब अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर भी ज्यादा जोर दे रहे हैं और भारत के साथ-साथ चीन जैसे देशों के साथ भी नए समझौते कर रहे हैं।
Usa: जर्मनी के बयान से मचा हंगामा
इसी बीच जर्मनी की ओर से आया एक बयान अमेरिका के लिए एक तरह की “लक्ष्मण रेखा” माना जा रहा है। सोमवार को जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के प्रवक्ता स्टीफन कोर्नेलिअस ने कहा कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से शुरू हुआ मध्य पूर्व का संघर्ष नाटो से जुड़ा मामला नहीं है।उन्होंने एक नियमित प्रेस ब्रीफिंग में साफ कहा कि नाटो एक रक्षात्मक गठबंधन है, जिसका मकसद सदस्य देशों की सुरक्षा करना है। मौजूदा स्थिति में नाटो को इस युद्ध में शामिल करने का कोई आधार नहीं बनता।
अमेरिका की ताकत पर पड़ सकता है असर
Usa: जर्मनी के इस बयान को कई विश्लेषक एक अहम संकेत के तौर पर देख रहे हैं। इसका मतलब यह माना जा रहा है कि अगर नाटो के किसी सदस्य देश पर कोई बाहरी देश हमला करता है, तो सभी सदस्य मिलकर उसकी रक्षा करेंगे। लेकिन अगर नाटो का कोई सदस्य देश खुद किसी दूसरे देश पर हमला करता है, तो जरूरी नहीं कि बाकी सदस्य उसके साथ युद्ध में शामिल हों। अगर यही रुख आगे भी बना रहता है, तो इससे अमेरिका की वैश्विक रणनीतिक ताकत पर असर पड़ सकता है। क्योंकि अब तक कई बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में पूरा नाटो गठबंधन उसके साथ खड़ा नजर आया। जर्मनी के ताजा बयान से यह संकेत मिल रहा है कि अब नाटो देश अमेरिका द्वारा शुरू किए गए हर युद्ध में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं।
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