VANDE MATRAM VIVAD: संसद में हालिया वंदे मातरम विवाद के बीच भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि यह मुद्दा राजनीति से अधिक संसदीय नियम और शिष्टाचार से जुड़ा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद में सदस्यों को नारे लगाने से रोकने वाला नियम दशकों से लागू है और इसे किसी सरकार ने नहीं, बल्कि लोकसभा, राज्यसभा और संविधान सभा के पीठासीन अधिकारियों ने निर्धारित किया था।
अनुशासन और व्यवहार से जुड़े नियम याद दिलाए
मालवीय ने कहा कि संसदीय बुलेटिन प्रत्येक सत्र से पहले जारी किए जाते हैं, जिसमें सदस्यों को सदन के भीतर अनुशासन और व्यवहार से जुड़े नियम याद दिलाए जाते हैं। यह प्रक्रिया दशकों से चली आ रही है और इसका उद्देश्य केवल संसदीय मर्यादा बनाए रखना है। उन्होंने संसदीय इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि 15 मार्च 1948 को संविधान सभा में जब एक सदस्य लगातार ‘थैंक यू’ बोल रहा था, तब अध्यक्ष ने स्पष्ट किया था: “नो थैंक्स, नो थैंक यू, नो जय हिंद, नो वंदे मातरम।” यानी सदन में किसी भी प्रकार के नारों या संबोधन की अनुमति नहीं है।
मालवीय ने यह भी बताया कि चीन पर बहस के दौरान एक सदस्य ने ‘भारत माता की जय’ कहा था, तो स्पीकर ने तुरंत रोक लगा दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि 2003–2006 में ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम’ का उल्लेख था, 2007–2021 तक संक्षिप्त रूप में लिखा गया, और 2021 से फिर पूरा टेक्स्ट प्रकाशित हो रहा है।
VANDE MATRAM VIVAD: सदन के भीतर कोई नारा नहीं
उन्होंने कहा कि 24 नवंबर 2025 के विंटर सेशन में जारी बुलेटिन में भी वही पुरानी सलाह दोहराई गई: सदन के भीतर कोई नारा नहीं लगाया जाएगा।मालवीय ने यह स्पष्ट किया कि यह कोई सरकार का आदेश या राष्ट्रीय गीत पर पाबंदी नहीं है, बल्कि सिर्फ संसदीय मर्यादा और सदन की शिष्टाचार प्रथा है।मालवीय का कहना है कि इस विवाद को राजनीति की नजर से देखने की बजाय संसदीय नियमों और इतिहास के सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए।







