Bhopal Gas Tragedy: 3 दिसंबर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के इतिहास का सबसे भयानक दिन जब हजारों लोगों ने एक रात में अपनी जान गंवा दी थी इसीलिए इस दिन को ब्लैक डे कहना गलत नहीं होगा। इस दिन को याद करके आजभी लोगों का दिल दहल उठता है। चलिए जानते है इस दिन की पूरी कहानी।

Bhopal Gas Tragedy: 23 कर्मचारियों ने मौके पर ही दम तोड़ा
Bhopal Gas Tragedy: रात को करीब डेढ़ बजे पुराने भोपाल के कई इलाके जहरीले गैस के चपेट में आ गए थे, इन इलाकों में भोपाल जंक्शन भी शामिल था। गैस लीक के कुछ ही मिनटों में भोपाल रेलवे स्टेशन पर मौजूद स्टेशन सुपरिंटेंडेंट और 23 साथीयो ने दम तोड़ दिया था। लेकिन इस मुश्किल समय में जब हर कोई अपनी जान बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था वही कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह ना करके दूसरों को जान बचा ली। इसी में एक नाम है डिप्टी स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर का, जिनकी हिम्मत, समझदारी और हौसले ने हजारों जानों को बचा लिया।
गोरखपुर–मुंबई एक्सप्रेस को तुरंत रवाना करने का साहसिक निर्णय
Bhopal Gas Tragedy: 2 दिसंबर 1984 की आधी रात को जब पूरे स्टेशन पर जहरीली गैस के बादल छाए हुए थे। अब तक किसी को कोई अंदाजा नहीं था कि आखिर हुआ क्या है। धीरे धीरे लोगों ने दम दौड़ना शुरू कर दिया था और हर तरह अफरा तफरी मच गई थी। ऐसे में स्टेशन के उप-स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर जो उस समय ड्यूटी पर थे, उन्होंने तुरंत कार्रवाई करते हुए हजारों लोगों से भरी हुई गोरखपुर-मुंबई एक्सप्रेस को तुरंत भोपाल जंक्शन से रवाना करवाया और उनके द्वारा आस पास के सभी स्टेशनों को भोपाल आने वाली सभी ट्रेनों को रोकने के लिए कहां गया।

अफसर हरीश धुर्वे का बलिदान – कर्तव्य निभाते हुए गई जान
Bhopal Gas Tragedy: हालात को देखते हुए वह अपने वरिष्ठ अधिकारी हरीश धुर्वे के कार्यालय के ओर गए जहां के हालात और खराब नजर आए। हरीश धुर्वे भी दम तोड़ चुके थे, दरअसल वह प्लेटफॉर्म नंबर 1 के उत्तरी छोड़ की तरफ गए थे ताकि वहां आने वाली एक्सप्रेस को बिना रूखे रवाना किया जा सकें। इसी कोशिश में वह जहरीली गैस के चपेट में आ गए और दम तोड़ दिया। हालात बहुत गंभीर थे और स्टेशन पर 23 कर्मचारी दम तोड़ चुके थे। ऐसे में जब दस्तगीर गोरखपुर-मुंबई एक्सप्रेस को स्टेशन आते हुए देखा तो उन्होंने बिना देरी के मौजूदा कर्मचारियों को ट्रैक खाली करने के आदेश दिए और 15 मिनट पहले ट्रेन को रवाना कर दिया।
दस्तगीर ने खुद के जान की परवाह न की, आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ, घुटन का एहसास होने के बाद भी उन्होंने अपने तरफ से लोगों की जान बचाने के हर संभव प्रयास दिए। आसपास के स्टेशनों को समय पर सूचित करने और ट्रेनों को आने से रोकने के उनके इस प्रयास ने कई लोगों की जान बचा ली। जहर के असर से वह भी बेहोश हो गए थे और बहुत मुश्किल से उनकी जान बचाई गई थी।

Bhopal Gas Tragedy: 2003 में हुआ गुलाम दस्तगीर का निधन
Bhopal Gas Tragedy: इस बीच दस्तगीर खुद भी घुटन और सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहे थे। इसके बावजूद भी उन्होंने तुरंत आसपास के स्टेशनों को सूचित किया कि वे भोपाल की ओर आने वाली सभी ट्रेनों को रोक दें। उनके इस प्रयास से कई लोगों की जान बची। बाद में खुद दस्तगीर भी बेहोश हो गए और उन्हें भी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बमुश्किल उनकी जान बची। इस घटना में स्टेशन के 23 कर्मचारी भी मारे गए थे। हालांकि गुलाम दस्तगीर का निधन 2003 में हुआ।
कौन सी गैस हुई थी लीक?
Bhopal Gas Tragedy: यह घटना भोपाल गैस त्रासदी का एक हिस्सा थी, जो दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक मानी जाती है। इस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के कीटनाशक संयंत्र से आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था। रिसाव के कारण हजारों लोगों की तत्काल मृत्यु हो गई थी और लाखों लोग प्रभावित हुए थे। इस गैस के संपर्क में आने से लोगों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हुईं, जिनमें श्वसन संबंधी रोग, आंखों की समस्याएं और कैंसर शामिल हैं।
यह भी पढ़ें: PARLIAMENT NEWS: सदन में किसानों के मुद्दे पर बवाल के समय कृषि मंत्री कंषाना हुए बेहोश







