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कौन था कालनेमि? रामायण के इस पात्र को CM योगी ने बताया चेतावनी का प्रतीक?

Kalnemi Kaun Tha

Kalnemi Kaun Tha: प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े मामले ने अब राजनीतिक और वैचारिक बहस का रूप ले लिया है। इस पूरे घटनाक्रम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रतिक्रिया देते हुए सनातन धर्म की शुद्धता और उसकी रक्षा पर जोर दिया है। सीएम योगी ने अपने बयान में कहा कि सनातन धर्म एक व्यापक और उदार परंपरा है, लेकिन कुछ लोग धर्म की आड़ में समाज को भ्रमित करने और सनातन मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों की पहचान बताते हुए ‘कालनेमि’ शब्द का प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि समाज को ऐसे तत्वों से सतर्क रहने की आवश्यकता है, जो बाहर से धार्मिक दिखते हैं लेकिन भीतर से धर्म-विरोधी सोच पर काम करते हैं। सीएम योगी ने किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिए बिना सनातन धर्म की रक्षा और सामाजिक चेतना पर जोर दिया, जिसे उनके समर्थकों ने धर्म और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में मजबूत संदेश बताया।

कौन था कालनेमि?

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कालनेमि एक मायावी राक्षस था जो लंकापति रावण का शक्तिशाली अनुचर माना जाता था। वह रूप बदलने और भ्रम पैदा करने में माहिर था। कथा के अनुसार, जब युद्ध में मेघनाथ ने लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया था, तब उनके प्राण बचाने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरी पर्वत की ओर गए थे। रावण जानता था कि यदि समय पर संजीवनी नहीं पहुंची तो लक्ष्मण को बचाना संभव नहीं होगा। इसी कारण उसने कालनेमि को हनुमान जी का मार्ग रोकने भेजा। कालनेमि ने साधु का वेश धारण कर एक मायावी आश्रम और सरोवर का निर्माण किया और राम नाम का जाप करते हुए हनुमान जी को भ्रमित करने का प्रयास किया।

Kalnemi Kaun Tha: हनुमान जी की विवेकशीलता और अधर्म का अंत

कथा के अनुसार, कालनेमि की माया अंततः सफल नहीं हुई। एक घटना के माध्यम से हनुमान जी को उसकी असलियत का पता चला और उन्होंने उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लौटे और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा हुई।

वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ के बयान के बाद ‘कालनेमि’ शब्द एक बार फिर चर्चा में आ गया है। जानकारों के अनुसार, मुख्यमंत्री ने इस पौराणिक उदाहरण के माध्यम से यह संदेश दिया कि समाज को सच्चे धर्म और दिखावे के बीच अंतर समझना चाहिए। उनका यह बयान सनातन मूल्यों की रक्षा, सामाजिक जागरूकता और धार्मिक पारदर्शिता की ओर एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

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