New Delhi: अभी अंधेरा पूरी तरह छंटा भी नहीं था। ठंडी हवा चेहरे को चीर रही थी। शरीर पर ऊनी कपड़ों की कई परतें थीं, फिर भी कंपकंपी थमने का नाम नहीं ले रही थी। AIIMS दिल्ली के बाहर एक ऐसा मंजर सामने आया जिसने दिल को झकझोर कर रख दिया।
New Delhi: ज़मीन ही बिस्तर, कंबल ही सहारा
सैकड़ों लोग ज़मीन पर लेटे थे। इतने पास-पास कि दूर से देखने पर लगा मानो फर्श पर इंसानों की नहीं, कंबलों की एक लंबी चादर बिछी हो।किसी के पास मोटा कंबल था, तो कोई पतली चादर में ही खुद को समेटे ठंड से जंग लड़ रहा था। उंगलियाँ कंबल के किनारों को कसकर पकड़े थीं मानो हवा के हर झोंके से उम्मीदें उड़ न जाएँ।
New Delhi: इलाज की आस में जमी हुई ज़िंदगियाँ
ये लोग यहाँ शौक से नहीं थे।कोई माँ के इलाज के लिए आया था, कोई पिता को बचाने की आख़िरी उम्मीद लेकर,तो कोई अपने बच्चे की सांसें गिनता हुआ इस सर्द फर्श पर पड़ा था।यहां हर चेहरा थका हुआ था, हर आंख में इंतज़ार था—और हर दिल में डर कि “आज नंबर आएगा या नहीं?”
गरीबी बनाम बीमारी: सबसे क्रूर मुकाबला
देश के कोने-कोने से आए ये परिवार इलाज की उम्मीद में यहां डटे हैं। लेकिन इस उम्मीद की कीमत है— बर्फ जैसी ठंड में रातें अंत हीन इंतज़ार और अपनों को तड़पता देखने की मजबूरी यहां बीमारी से ज़्यादा दर्दनाक है बेबसी। ये सिर्फ़ तस्वीर नहीं, सिस्टम पर सवाल है ये मंजर किसी कहानी का हिस्सा नहीं ये हमारी हकीकत है। जहां इलाज पाने से पहले इंसान को मौसम, हालात और सिस्टम तीनों से लड़ना पड़ता है।दिल्ली की सड़कों पर खड़े ये लोग सिर्फ़ मरीजों के परिजन नहीं हैं,
New Delhi: ये उस व्यवस्था का आईना हैं—
जिसमें उम्मीद तो मिलती है,लेकिन सहूलियत नहीं।बड़ी बात इलाज देश का सबसे बड़ा अस्पताल दे रहा है लेकिन इंतज़ार और ठंड मरीजों को तोड़ रही है सवाल ये नहीं कि AIIMS क्यों भरा है सवाल ये है कि क्या इलाज तक पहुंच इतनी बेरहम होनी चाहिए?
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