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धोती‑कुर्ता और संस्कृत कमेंट्री के साथ क्रिकेट का अनोखा उत्सव, वेदपाठी बटुकों ने लगाए चौके‑छक्के

धोती‑कुर्ता और संस्कृत कमेंट्री के साथ क्रिकेट का अनोखा उत्सव, वेदपाठी बटुकों ने लगाए चौके‑छक्के

Varanasi News:  जब आम क्रिकेट के आयोजन की बात आती है तो हर कोई टी‑शर्ट और जर्सी पहनकर मैदान में उतरता है। लेकिन काशी के रामापुरा मैदान में मंगलवार को क्रिकेट ने एक बिल्कुल अलग रूप दिखाया। यहाँ के वेदपाठी बटुक धोती‑कुर्ता, तिलक‑शिखा और त्रिपुंड के साथ मैदान में उतरे और पारंपरिक अंदाज में क्रिकेट खेला।15 वर्षों से नियमित होने वाला यह आयोजन युवाओं में संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने का काम करता रहा है।

Varanasi News: मैदान पर चमकी पारंपरिक पोशाक

खिलाड़ी केवल खेल के लिए नहीं, बल्कि अपने पोशाक के कारण भी दर्शकों का ध्यान खींचते नजर आए। धोती‑कुर्ता, शिखा और त्रिपुंड पहने वेदपाठी बटुक मैदान पर उतरे, मानो आधुनिक क्रिकेट के मैदान में प्राचीन काल के चाणक्य और उनके अनुयायी उतर आए हों।पिछले 15 सालों में यह आयोजन युवाओं के बीच उत्साह और संस्कृत ज्ञान को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण कार्यक्रम बन गया है।

Varanasi News: संस्कृत में हुई कमेंट्री ने बढ़ाया रोमांच

मैच का रोमांच तब चरम पर पहुंचा जब मैदान से बाहर कमेंटेटर ने संपूर्ण कमेंट्री संस्कृत में की। जैसे ही कोई चौका या छक्का लगा, तो कमेंटेटर के शब्दों से मैदान में उत्साह की लहर दौड़ जाती।संस्कृत में “सुप्रसन्नः बल्लकः छक्का अंकितवान्!” जैसे कमेंट सुनकर दर्शक हंसी और तालियों से अभिवादन कर रहे थे। इसने खेल को सिर्फ प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और भाषा के उत्सव में बदल दिया।

युवा वेदपाठी बटुकों की जोशभरी भागीदारी

आयोजन में संस्कृत विद्यालयों की अलग‑अलग टीमें भाग ले रही थीं। युवा वेदपाठी मैदान पर जोश और अनुशासन के साथ खेल रहे थे।पवन शुक्ला ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य न केवल क्रिकेट को बढ़ावा देना है, बल्कि युवाओं को संस्कृत, भारतीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ना भी है।

Varanasi News: चौके‑छक्कों से गूंजा रामापुरा मैदान

मैच के दौरान कई शानदार चौके और छक्के लगे। मैदान में जमा दर्शक, युवा और बुजुर्ग सभी इस अद्वितीय आयोजन का आनंद उठाते रहे। पारंपरिक पोशाक और संस्कृत कमेंट्री ने इस आयोजन को केवल खेल नहीं बल्कि संस्कृति और शिक्षा का उत्सव बना दिया।काशी का यह अनोखा क्रिकेट आयोजन दिखाता है कि आधुनिक खेल और पारंपरिक संस्कृति साथ-साथ जीवित रह सकते हैं। वेदपाठी बटुकों का उत्साह, पारंपरिक पोशाक और संस्कृत कमेंट्री ने इस मैच को यादगार और अद्वितीय बना दिया।

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