India EU Trade Deal: वाशिंगटन, 29 जनवरी।भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा संभालते हैं। दोनों मिलकर दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी और 33 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यूरोपीय संघ के साथ भारत का व्यापार करीब 25 अरब डॉलर का है। वहीं अमेरिका के साथ भारत का व्यापार 45 अरब डॉलर तक पहुंचता है। इसके बावजूद अमेरिका ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर चिंता जाहिर की है।
अमेरिका की बढ़ती चिंता
अमेरिका के कई प्रभावशाली सीनेटरों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता अमेरिका को वैश्विक व्यापार व्यवस्था में पीछे छोड़ सकता है। उनका कहना है कि इस समझौते से नई दिल्ली और ब्रुसेल्स मिलकर व्यापार और रणनीतिक साझेदारियों को नया आकार दे सकते हैं।

India EU Trade Deal: अमेरिकी सहयोगियों में असंतोष
सीनेटर मार्क केली ने कहा कि यह समझौता अमेरिका की व्यापार नीति को लेकर उसके सहयोगी देशों की बढ़ती नाराज़गी को दिखाता है। एरिज़ोना से डेमोक्रेट सीनेटर केली ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यूरोपीय संघ ने भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा समझौता किया है, जबकि कनाडा और ब्रिटेन चीन के साथ बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया, जिनसे अमेरिका के सहयोगी देश नाराज़ हुए हैं।
ट्रंप नीतियों पर सीधा आरोप
केली ने चेतावनी दी कि ऐसे फैसलों का असर अमेरिका पर नकारात्मक रूप से पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका के सहयोगी जब दूसरे देशों के साथ समझौते करते हैं, तो उसका प्रभाव अमेरिका पर भी पड़ता है और यह स्थिति चिंताजनक है।
भारत और यूरोपीय संघ के इस समझौते की घोषणा इसी सप्ताह नई दिल्ली में की गई। दोनों पक्षों के नेताओं ने इसे भारत के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बताया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे सभी व्यापार समझौतों में सबसे महत्वपूर्ण बताया।
India EU Trade Deal: नई दिल्ली में समझौते की घोषणा
उनका कहना है कि इस समझौते से लगभग दो अरब लोगों को जोड़ने वाला एक विशाल मुक्त व्यापार क्षेत्र बनेगा, जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब वैश्विक व्यापार में तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है, और यह दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को करीब लाता है।
ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यूरोप के इस कदम पर असंतोष जताया। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने टैरिफ को लेकर अमेरिका के साथ सहमति न बनने पर यूरोपीय संघ की आलोचना की।

यूरोप के फैसले से अमेरिका निराश
सीएनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देशों को वही करना चाहिए जो उनके हित में हो, लेकिन उन्हें यूरोप का रुख निराशाजनक लगा। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ अमेरिका के साथ उच्च टैरिफ नीति अपनाने को तैयार नहीं था और बाद में यह सामने आया कि वे भारत के साथ व्यापार समझौता करने की तैयारी में थे।
वाशिंगटन के नीति विशेषज्ञों ने इसे अमेरिकी व्यापार नीति के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा है। सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार फाउंडेशन ने कहा कि यह समझौता दिखाता है कि अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आगे बढ़ रही हैं, जबकि अमेरिका पीछे रह रहा है।
आईटीआईएफ के एसोसिएट डायरेक्टर रोड्रिगो बालबोटिन ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ का यह समझौता अमेरिका के लिए सीख लेने का अवसर होना चाहिए। उनका कहना है कि जब दूसरे देश टैरिफ घटा रहे हैं और नए व्यापार नियम अपना रहे हैं, तब अमेरिका खुद को अलग-थलग पा रहा है।
समझौते की आंतरिक चुनौतियां
हालांकि बालबोटिन ने यह भी कहा कि इस समझौते में कुछ कमियां हैं। उनके अनुसार यूरोपीय संघ के कई डिजिटल नियम, खासकर डिजिटल बाजार अधिनियम, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ भेदभाव करते हैं। इसके अलावा, बौद्धिक संपदा संरक्षण के मामले में भारत अब भी दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। इसके बावजूद उनका मानना है कि इस समझौते से अमेरिका को अप्रत्यक्ष रूप से कुछ लाभ मिल सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर यह समझौता सीमा के भीतर मौजूद व्यापारिक बाधाओं को कम करता है, तो अंततः इसका फायदा अमेरिका को भी हो सकता है।
आईटीआईएफ ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच मजबूत होते आर्थिक रिश्तों का स्वागत किया है। बालबोटिन ने कहा कि बढ़ते संरक्षणवाद के दौर में दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता सकारात्मक कदम है।

India EU Trade Deal: चीन सबसे बड़ी चुनौती
उन्होंने यह भी कहा कि इस सदी की सबसे बड़ी व्यापारिक चुनौती चीन की नीतियां हैं। वहीं, कुछ अन्य व्यापार विशेषज्ञों ने इस समझौते के प्रभाव को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है।
अमेरिका के पूर्व व्यापार अधिकारी मार्क लिन्स्कॉट ने इसे एक बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया, लेकिन इसके प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बचने की बात कही। उन्होंने लिखा कि इस समझौते पर ध्यान देना ज़रूरी है, लेकिन इससे वैश्विक व्यापार या आर्थिक विकास में कोई बड़ा बदलाव तुरंत देखने को नहीं मिलेगा।
लिन्स्कॉट के अनुसार, शुल्क में धीरे-धीरे कटौती और नियमों में स्पष्टता आने से इसके फायदे समय के साथ सामने आएंगे। कृषि, बौद्धिक संपदा अधिकार और यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन जैसे संवेदनशील मुद्दों को भविष्य की बातचीत के लिए टाल दिया गया है।
अमेरिका-भारत व्यापार को गति
उन्होंने यह भी बताया कि इस समझौते को लागू करने से पहले यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और यूरोपीय संसद से मंजूरी लेनी होगी।
वाशिंगटन के नजरिए से लिन्स्कॉट ने कहा कि इस समझौते से अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों को नुकसान नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि इससे भारत या यूरोपीय संघ के साथ अमेरिका के संबंध कमजोर नहीं होंगे, बल्कि यह अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की दिशा में गति भी दे सकता है।
भारत और यूरोपीय संघ ने पहली बार 2007 में व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू की थी, लेकिन शुल्क, बाजार पहुंच और नियमों को लेकर मतभेदों के कारण यह प्रक्रिया लंबे समय तक रुकी रही। 2021 में बातचीत दोबारा शुरू हुई। इस समझौते का पूरा असर सामने आने में अभी समय लगेगा, लेकिन वाशिंगटन से मिल रही प्रतिक्रियाएं यह संकेत देती हैं कि जैसे-जैसे वैश्विक मुक्त व्यापार आगे बढ़ेगा, अमेरिका को अपनी व्यापार नीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
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