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मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की पहल, भारत ने यूनेस्को को सौंपा नामांकन दस्तावेज

मेघालय के खासी और जयंतिया पहाड़ियों में स्थित जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के लिए भारत ने यूनेस्को को नामांकन दस्तावेज सौंपा है। यह पहल प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के उद्देश्य से की गई है।
मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर बनाने की पहल

Root Bridges: भारत ने मेघालय के विश्वप्रसिद्ध जीवित जड़ पुलों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक अहम पहल की है। भारत सरकार ने मेघालय की इस अनूठी और जीवंत विरासत को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए औपचारिक रूप से नामांकन दस्तावेज प्रस्तुत किया है। यह प्रस्ताव 2026–27 के विश्व धरोहर मूल्यांकन चक्र के तहत विचार के लिए भेजा गया है, जिससे मेघालय की स्वदेशी परंपराओं और प्रकृति के साथ सामंजस्य की वैश्विक मान्यता की उम्मीद बढ़ गई है।

Root Bridges: मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर बनाने की पहल
मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर बनाने की पहल

जिंगकिएंग ज्री सांस्कृतिक परिदृश्य

यह नामांकन “जिंगकिएंग ज्री / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य” शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। यूनेस्को में भारत के राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा ने यह दस्तावेज यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र के निदेशक लाज़ारे असोमो एलौंडू को सौंपा। यह कदम भारत की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत देश अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर संरक्षित और प्रोत्साहित करना चाहता है।

Root Bridges: खासी और जयंतिया समुदाय की विरासत

प्रस्तावित सांस्कृतिक परिदृश्य मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियों में फैला हुआ है। यह क्षेत्र सदियों से स्वदेशी खासी और जयंतिया समुदायों द्वारा विकसित, संरक्षित और संवर्धित किया गया है। यह विरासत मानव, प्रकृति और आस्था प्रणालियों के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है, जो पारंपरिक भूमि प्रबंधन, सामुदायिक शासन और टिकाऊ पारिस्थितिक संरक्षण की प्रथाओं के रूप में आज भी जीवित है।

Root Bridges: मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर बनाने की पहल
मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर बनाने की पहल

पर्यावरण और संस्कृति का संगम

इस नामांकन के केंद्र में जीवित जड़ पुल हैं, जिन्हें पेड़ों की जड़ों को सावधानीपूर्वक दिशा देकर कई वर्षों में प्राकृतिक रूप से विकसित किया जाता है। ये पुल न केवल दुर्गम इलाकों में आवागमन का साधन हैं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक भी हैं। ये संरचनाएं स्वदेशी दर्शन ‘मेई रामेव’, यानी धरती माता के प्रति श्रद्धा को अभिव्यक्त करती हैं, जिसमें प्रकृति की रक्षा को सामूहिक जिम्मेदारी माना जाता है।

भारतीय अधिकारियों और समुदाय का योगदान

राजदूत विशाल वी. शर्मा ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय संस्कृति मंत्री और मेघालय के मुख्यमंत्री के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि इस विरासत के संरक्षण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विदेश मंत्रालय और स्थानीय समुदायों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रयास जीवित सांस्कृतिक परिदृश्यों के संरक्षण और यूनेस्को के माध्यम से वैश्विक विरासत संरक्षण सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

Written by- Anurag Vishwakarma

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