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अरावली पहाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेकर आज होगी अहम सुनवाई

पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। सोमवार को शीर्ष अदालत इस मामले पर सुनवाई करेगी, जिसमें अरावली की परिभाषा, संरक्षण और अवैध खनन जैसे अहम मुद्दों पर विचार किया जाएगा।

Aravalli Hills: पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। सोमवार को शीर्ष अदालत इस मामले पर सुनवाई करेगी, जिसमें अरावली की परिभाषा, संरक्षण और अवैध खनन जैसे अहम मुद्दों पर विचार किया जाएगा। अदालत की इस पहल को अरावली संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

तीन जजों की बेंच करेगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की कॉज लिस्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह शामिल हैं, “इन रे: अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और संबंधित मुद्दे” शीर्षक से दायर स्वतः संज्ञान रिट याचिका पर सुनवाई करेगी।

Aravalli Hills: बढ़ती पर्यावरणीय चिंताओं के बीच अदालत की पहल

अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई है और इसे देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में गिना जाता है। हाल के वर्षों में यहां अवैध खनन, अतिक्रमण और पर्यावरण क्षरण को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। इन्हीं हालातों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया है।

केंद्र सरकार ने नई माइनिंग लीज पर लगाई रोक

अरावली की सुरक्षा के मद्देनजर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि अरावली क्षेत्र में किसी भी नई खनन लीज को मंजूरी न दी जाए। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध पूरे अरावली क्षेत्र में समान रूप से लागू होगा।

इसके साथ ही इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) को निर्देश दिए गए हैं कि वह ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करे, जहां खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

Aravalli Hills: नई परिभाषा पर उठे सवाल, जयराम रमेश का विरोध

कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अरावली की नई परिभाषा पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर कहा कि नई परिभाषा में अरावली को केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भू-आकृतियों तक सीमित कर दिया गया है, जो संरक्षण के उद्देश्य को कमजोर करता है। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह परिभाषा अरावली के अस्तित्व और पर्यावरणीय संतुलन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

संरक्षण बनाम विकास की बहस तेज

सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि अरावली संरक्षण को लेकर भविष्य की दिशा क्या होगी। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की यह लड़ाई आने वाले समय में और अहम मानी जा रही है।

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