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कोलकाता में गीता पाठ के बीच हिंसा: क्या बंगाल की आज़ादी की पहचान खतरे में?

कोलकाता में गीता पाठ कार्यक्रम के दौरान हॉकर्स पर हुए हमले ने बंगाल की व्यक्तिगत स्वतंत्रता वाली पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सदियों से स्वतंत्र सोच की भूमि रहा बंगाल किसी भी ज़बरदस्ती या दबाव को स्वीकार नहीं करता, और यह घटना उसी मूल भावना के विरुद्ध मानी जा रही है।
कोलकाता मैदान की चौंकाने वाली घटना

Bengal Violence: हुगली में सदियों से बंगाली लोग अपने घरों और मंदिरों में गीता और रामायण का पाठ करते रहे हैं, लेकिन पिछले रविवार को पहली बार गीता पाठ को एक राजनीतिक रंग देते हुए देखा गया। इस कार्यक्रम के दौरान रविन्द्रनाथ ठाकुर, विद्यासागर, बंकिमचंद्र, काज़ी नज़रुल, श्रीरामकृष्ण और विवेकानंद जैसे महान लोगों की भूमि बंगाल “गोरक्षा” से जुड़े विवादों की छाया में भी दिखी।

Bengal Violence: गीता पाठ ने लिया विवाद का रूप

वहीं दूसरी ओर, कोलकाता के मैदान, विक्टोरिया, चिड़ियाघर, ईडन गार्डेंस और शहर के हर हिस्से में दशकों से मौजूद हॉकर्स सस्ते और स्वादिष्ट खाने से लोगों का पेट भरते रहे हैं। बंगाल के लोग दफ्तर जाते समय, डेकर्स लेन या मैदान जाते हुए इन हॉकर्स के खाने के बिना अपने दिन और स्वाद की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि पूरे देश में इतनी कम कीमत पर इतना भरपेट स्वादिष्ट खाना शायद ही कहीं मिले।

Bengal Violence: कोलकाता मैदान की चौंकाने वाली घटना
कोलकाता मैदान की चौंकाने वाली घटना

20 साल से काम कर रहे रफीकुल के साथ क्या हुआ?

Bengal Violence:  पिछले रविवार कोलकाता मैदान में हुए 5 लाख लोगों के गीता पाठ के बड़े आयोजन के दौरान एक बहुत दुखद घटना हुई। रफीकुल इस्लाम नाम के एक पैंटिस (नॉन-वेज स्नैक्स) बेचने वाले को मांसाहारी पैंटिस बेच की वजह से कुछ लोगों ने उसे मारा और उसका सारा सामान जमीन पर फेंककर बर्बाद कर दिया, इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है।

रफीकुल इस्लाम ने बताया कि वे पिछले 20 सालों से इसी काम को करके अपने परिवार को चला रहे हैं। उनके परिवार में तीन बच्चे और पत्नी हैं। बड़े राजनीतिक, धार्मिक या खेल आयोजनों में भीड़ होती है, तो उनकी कमाई थोड़ी बढ़ जाती है, जिससे घर चल पाता है। लेकिन रविवार को जो उनके साथ हुआ, ऐसा उन्होंने कभी नहीं देखा था। आर्थिक नुकसान तो हुआ ही, लेकिन लोगों के सामने अपमानित होने से उनका मन पूरी तरह टूट गया है। उन्हें कभी बंगाल में नॉन-वेज बेचने पर किसी ने रोका नहीं था। अब वे डर गए हैं, क्योंकि इतनी भीड़ होने बाद भी वह मौजूद किसी भी व्यक्ति ने उनकी मदद के लिए आवाज तक नहीं उठाई।

बंगाल में आज भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि

Bengal Violence: आज भी बंगाल में यह मान्यता मजबूत है कि हर एक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह क्या खाएगा, क्या पहनेगा, किस धर्म को मानेगा और कौन-सा काम करेगा, यह उसका निजी फैसला है। जो भी लोग इस तरह की हरकतों के ज़रिए बंगाल पर “गो-बलय” जैसी सोच थोपना चाहते हैं, उन्हें यह याद रखने की जरूरत है कि यह क्रांतिकारियों और विचारकों की भूमि है। इस भूमि पर किसी भी तरह की ज़बरदस्ती या डर का आदेश कभी स्वीकार नहीं किया जाता। हर गलत काम का एक बराबर और विपरीत जवाब आता है और यह सच उन्हें नहीं भूलना चाहिए।

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