Bihar Madhepura: आज मुरलीगंज और बिहारीगंज भले ही मधेपुरा जिले के सामान्य कस्बों के रूप में देखे जाते हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब ये इलाके उत्तर बिहार में जूट (पटसन) के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में गिने जाते थे। जूट की खेती और व्यापार ने न सिर्फ यहां के किसानों को समृद्ध किया, बल्कि पूरे मधेपुरा जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी थी।
कच्चे जूट की खरीद-बिक्री का केंद्र
स्थानीय बुजुर्गों और पुराने व्यापारियों के अनुसार, बिहारीगंज की मंडी कभी कच्चे जूट की सबसे बड़ी खरीद-बिक्री का केंद्र हुआ करती थी। खगड़िया के बेलदौर, सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर सहित कोसी क्षेत्र के कई इलाकों से किसान बैलगाड़ियों और नावों के जरिए पाट लेकर बिहारीगंज पहुंचते थे। यहीं से व्यापारी जूट को पूर्णिया, कटिहार और सहरसा होते हुए कोलकाता की जूट मिलों तक भेजते थे।
Bihar Madhepura: किसानों के लिए ‘सोने की फसल’ था जूट
उस दौर में जूट को ‘सोने की फसल’ कहा जाता था। यह किसानों की सबसे भरोसेमंद नकदी फसल थी, जिससे बच्चों की पढ़ाई, घर-गृहस्थी, शादी-ब्याह और रोजगार तक चलता था। मुरलीगंज और बिहारीगंज के बाजारों में तय होने वाले भाव पूरे इलाके के लिए मानक माने जाते थे। बिहारीगंज में बड़े-बड़े गोदाम, तौल केंद्र और व्यापारिक प्रतिष्ठान थे, जहां सैकड़ों मजदूर जूट की सुखाई, बंडलिंग और ढुलाई में लगे रहते थे। मुरलीगंज इस पूरे नेटवर्क का अहम पड़ाव था, जहां जूट का संग्रह और परिवहन होता था।
समय बदला, पहचान धुंधली पड़ी
लेकिन समय के साथ हालात बदलते चले गए। सिंथेटिक फाइबर का बढ़ता चलन, जूट मिलों का बंद होना और सरकारी संरक्षण की कमी ने जूट की खेती को धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिया। इसका सीधा असर मुरलीगंज और बिहारीगंज पर पड़ा और ये इलाके अपनी जूट हब की पहचान खोते चले गए। आज स्थिति यह है कि बिहारीगंज स्थित कृषि उत्पादन बाजार समिति में पाट की गांठ बनाने वाली प्रेस मशीन जंग खाकर खामोश पड़ी है। कभी यही मशीनें किसानों की मेहनत को बाजार से जोड़ती थीं। स्थानीय व्यापारी बताते हैं कि जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (JCI) का बिहारीगंज सेंटर बंद होने से किसानों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। पहले MSP पर सरकारी खरीद की उम्मीद रहती थी, अब किसान मजबूर होकर औने-पौने दाम पर जूट बेचने को विवश हैं।
Bihar Madhepura: MSP के बिना घटती खेती
मुरलीगंज में भले ही जेसीआई का कार्यालय आज भी मौजूद है, लेकिन बिहारीगंज जैसे बड़े जूट बाजार में सेंटर बंद होने से जूट की खेती का रकबा लगातार सिमटता जा रहा है। एक किसान का कहना है, “जब सरकारी खरीद ही नहीं होगी तो हम पाट क्यों उगाएं? लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।”
व्यापारी बोले- संभावनाएं अब भी जिंदा
बिहारीगंज के पुराने व्यापारी पुरुषोत्तम अग्रवाल बताते है कि “एक समय यहां 32 प्रेस हुआ करती थीं, जिनमें हजारों मजदूर काम करते थे। अब सिर्फ एक प्रेस बची है और मजदूर भी नहीं मिलते। अगर पानी के स्रोत विकसित हों और प्रोसेसिंग यूनिट लगे, तो यह बाजार फिर से जिंदा हो सकता है।”
Bihar Madhepura: नई उम्मीद, पुरानी मांग
पर्यावरण के लिहाज से जूट जैसे प्राकृतिक फाइबर की मांग देश-दुनिया में दोबारा बढ़ रही है। ऐसे में मुरलीगंज और बिहारीगंज के किसान और सामाजिक संगठन सरकार से उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनकी मांग है कि इस क्षेत्र को जूट क्लस्टर घोषित किया जाए, MSP व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए, जूट प्रोसेसिंग यूनिट या मिनी मिल की स्थापना हो और किसानों को आधुनिक तकनीक व बाजार की गारंटी मिले। वहीं अब सवाल यही है—क्या सरकार इस इलाके के गौरवशाली अतीत को नई पहचान दे पाएगी, या जूट की यह कहानी सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगी?
Report By: राजीव रंजन






