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जलवायु परिवर्तन ने दक्षिणी अफ्रीका में मचाई तबाही

दुनिया भर में मौसम का मिज़ाज तेजी से बदल रहा है। कहीं तेज़ तूफान, कहीं बर्फबारी, तो कहीं भीषण गर्मी और भारी बारिश लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही है। शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि अफ्रीका के लिए स्थानीय जलवायु मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। लंदन के इंपीरियल कॉलेज की प्रोफेसर फ्रीडेरिक ओटो के अनुसार, मौजूदा जलवायु मॉडल ज्यादातर अमेरिका और यूरोप में बनाए गए हैं।

Environment: दुनिया भर में मौसम का मिज़ाज तेजी से बदल रहा है। कहीं तेज़ तूफान, कहीं बर्फबारी, तो कहीं भीषण गर्मी और भारी बारिश लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बदलावों की सबसे बड़ी वजह इंसानों की गतिविधियाँ और उनसे पैदा हुआ जलवायु परिवर्तन है। इसका ताजा उदाहरण दक्षिणी अफ्रीका में देखने को मिला है, जहां रिकॉर्ड तोड़ बारिश और बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 3 लाख से अधिक लोग अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।

10 दिनों में बरस गया पूरे साल का पानी

वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) की एक स्टडी में दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, जिम्बाब्वे और इस्वातिनी में हुई अत्यधिक बारिश का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इन इलाकों में सिर्फ 10 दिनों में उतनी बारिश हुई, जितनी आमतौर पर पूरे साल में होती है। इसका नतीजा यह रहा कि घर, सड़कें, पुल और दूसरी बुनियादी सुविधाएं बुरी तरह तबाह हो गईं। आर्थिक नुकसान का आंकड़ा लाखों डॉलर में पहुंच गया है। मोजाम्बिक के कई इलाके पूरी तरह पानी में डूब गए, जबकि दक्षिण अफ्रीका के लिम्पोपो और म्पुमलंगा प्रांतों और जिम्बाब्वे के कुछ हिस्सों में सड़कें और पुल बह गए।

Environment: वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया अध्ययन

यह अध्ययन दुनिया भर के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया है, जिसमें वैज्ञानिक तरीकों से यह समझने की कोशिश की गई कि जलवायु परिवर्तन का इस आपदा में कितना बड़ा रोल रहा। शोध में सामने आया कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की वजह से इस क्षेत्र में भारी बारिश की तीव्रता करीब 40 फीसदी तक बढ़ चुकी है। कमजोर ला नीना मौसम पैटर्न ने हालात को और खराब कर दिया, क्योंकि गर्म वातावरण में नमी ज्यादा खतरनाक रूप ले लेती है।

Environment: इंसानी गतिविधियों से बढ़ रही बारिश की मार

रॉयल नीदरलैंड्स मौसम विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक इजिडीन पिंटो ने कहा कि लगातार जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से मौसम की चरम घटनाएं और ज्यादा खतरनाक हो गई हैं। उन्होंने बताया कि जो बारिश पहले सामान्य मानी जाती थी, अब वही विनाशकारी बाढ़ में बदल रही है।

वैज्ञानिक भी रह गए हैरान

दक्षिणी अफ्रीका के ये इलाके पहले भी बाढ़ झेल चुके हैं, लेकिन इस बार की स्थिति उम्मीद से कहीं ज्यादा गंभीर रही। मोजाम्बिक मौसम सेवा के शोधकर्ता बर्नाडिनो न्हांटुम्बो के मुताबिक, कुछ इलाकों में सिर्फ 2 से 3 दिनों में उतनी बारिश हो गई, जितनी आमतौर पर पूरे मानसून सीजन में होती है। ऐसे हालात में हालात संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है।

9 नदियों के निचले हिस्से में बसा है मोजाम्बिक

न्हांटुम्बो ने बताया कि मोजाम्बिक नौ बड़ी नदियों के निचले इलाकों में स्थित है। ऐसे में जब भारी बारिश होती है, तो नदियों में उफान आना तय होता है और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। मध्य और दक्षिणी मोजाम्बिक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां गाजा प्रांत की राजधानी जाई-जाई और चोकवे शहर बड़े पैमाने पर जलमग्न हो गए।

अफ्रीका के लिए अलग जलवायु मॉडल जरूरी

Environment: शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि अफ्रीका के लिए स्थानीय जलवायु मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। लंदन के इंपीरियल कॉलेज की प्रोफेसर फ्रीडेरिक ओटो के अनुसार, मौजूदा जलवायु मॉडल ज्यादातर अमेरिका और यूरोप में बनाए गए हैं, जिससे अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में उनकी सटीकता कम हो जाती है। यही वजह है कि यहां जलवायु परिवर्तन के असर को पूरी तरह मापना अब भी चुनौती बना हुआ है। यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ भविष्य की समस्या नहीं रहा, बल्कि वर्तमान में ही कमजोर और विकासशील देशों के लिए बड़ी तबाही बन चुका है।

 

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