Finance Bill 2026: सोमवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में दो महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने वाली हैं। इनमें वित्त विधेयक 2026-27 और कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक 2026 शामिल हैं।वित्त विधेयक का उद्देश्य वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को लागू करना है। वित्त मंत्री इस विधेयक पर चर्चा कराने का प्रस्ताव रखेंगी और इसे संसद से पारित कराने की कोशिश करेंगी। यह कदम आने वाले साल के लिए सरकार की बजट योजनाओं और आर्थिक नीतियों को लागू करने की दिशा में काफी अहम माना जा रहा है।
कॉर्पोरेट कानून संशोधन बिल पेश
संसद के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार वित्त मंत्री लोकसभा में कॉर्पोरेट कानूनों में बदलाव से जुड़ा एक और बिल भी पेश करेंगी। कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक 2026 के तहत सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 (LLP Act) और कंपनी अधिनियम, 2013 में संशोधन करने का प्रावधान रखा गया है।
कंपनी अधिनियम, 2013 के जरिए कंपनियों की स्थापना, उनके संचालन, कॉर्पोरेट प्रशासन, जानकारी के खुलासे और कंपनी बंद करने से जुड़ी प्रक्रियाओं को नियंत्रित किया जाता है। वहीं एलएलपी अधिनियम 2008 साझेदारी फर्मों को सीमित देयता के साथ काम करने की सुविधा देता है और उन्हें अधिक लचीला ढांचा प्रदान करता है।

Finance Bill 2026: IBC संशोधन बिल का रास्ता साफ
इसके अलावा, केंद्र सरकार की कैबिनेट ने 10 मार्च को दिवालियापन और दिवालिया संहिता (IBC) में संशोधन को मंजूरी दे दी थी। इससे मौजूदा संसदीय सत्र में आईबीसी संशोधन विधेयक पेश करने का रास्ता साफ हो गया है।
इन प्रस्तावित बदलावों का आधार एक विशेष संसदीय समिति की सिफारिशें हैं। इस समिति की अध्यक्षता भारतीय जनता पार्टी के सांसद बैजयंत पांडा कर रहे थे। समिति को मौजूदा दिवालियापन प्रणाली की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। अपनी जांच पूरी करने के बाद समिति ने दिसंबर 2025 में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की, जिसमें खास तौर पर कॉर्पोरेट समाधान प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया गया।
लेनदारों को अधिक अधिकार देने की सिफारिश
समिति ने यह भी पाया कि मौजूदा व्यवस्था में मामलों के निपटारे में काफी देरी हो रही है। इस समस्या को दूर करने के लिए समिति ने दिवालियापन मामलों के समाधान के लिए सख्त समयसीमा तय करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही लेनदारों की समिति को ज्यादा अधिकार देने का सुझाव भी दिया गया है, ताकि कर्जदाताओं को मामलों का जल्दी और प्रभावी समाधान करने में मदद मिल सके।
प्रस्तावित संशोधनों के जरिए मौजूदा कानून की कुछ कमियों को दूर करने का भी प्रयास किया गया है। इसके तहत दो महत्वपूर्ण संरचनात्मक व्यवस्थाएं लाने का प्रस्ताव है। इनमें सबसे प्रमुख सीमा-पार दिवालियापन के लिए एक अलग तंत्र बनाना है, जिससे उन कंपनियों के मामलों को बेहतर तरीके से संभाला जा सके जिनकी संपत्तियां या लेनदार दूसरे देशों में भी मौजूद हैं।
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