Golden Temple Curzon Clock: पंजाब के अमृतसर में मौजूद श्री दरबार साहिब में दशकों पुरानी घड़ी एक बार फिर से चलने लगी है। यह एतिहासिक घड़ी को कर्जन घड़ी कहते है, जो 123 साल पुरानी है। इसी सुइयां 10 बजकर 8 मिनट पर रुख गई थी।
यह सिर्फ एक समय बताने वाली घड़ी नहीं है, 123 साल पुरानी यह घड़ी अपने आप में कई एतिहासिक घटनाओं की गवाह है। हर दिन कई श्रद्धालु इस घड़ी के नीचे से गुजरते रहे, लेकिन बहुत कम लोग ऊपर देख कर इसके बारे में जानने की जिज्ञासा रखते है। काफी समय से इस घड़ी की हालत जर्जर हो गई थी, जिस वजह से यह लंबे समय से बंद थी। लेकिन अब इसकी सुइयां एक बार फिर टिक-टिक करने लगी है।
लॉर्ड कर्जन ने भेंट की थी घड़ी
यह घड़ी कुल 123 साल पुरानी है और इसका संबंध ब्रिटिश शासनकाल में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन से है। दरअसल, लॉर्ड कर्जन अपनी पत्नी के साथ 9 अप्रैल 1900 में स्वर्ण मंदिर को देखने गए थे। इस दौरान उनका ध्यान वहां की दीवार पर लगी घड़ी पर गया, जो उन्हें ठीक नहीं लगी। उनका मानना था कि श्री दरबार साहिब की गरिमा और पवित्रता को ध्यान में रखते हुए यहां एक विशेष घड़ी लगाई जानी चाहिए।

जिसके बाद उन्होंने इंग्लैंड के बर्मिंघम में मौजूद एल्किंगटन एंड कंपनी को एक खास घड़ी बनाने का आदेश दिया। जिसके बाद इस घड़ी को बनाने ने दो साल की मेहनत मेहनत लगी और पीतल की यह भव्य घड़ी बन कर तैयार हुई। वही इसे 31 अक्टूबर 1902 को दीवाली के दिन और बंदी छोड़ दिवस के खास अवसर पर श्री दरबार साहिब को भेंट की गई।
Golden Temple Curzon Clock: घड़ी की चमक समय के साथ फीकी पड़ गई
समय के गुजरने के साथ ही इस खूबसूरत घड़ी की चमक भी फीकी पड़ गई। माना जाता है कि एक बार किसी दुर्घटना में इस घड़ी गिरने इसके ढांचे में दरारें आ गई थीं। जिसके बाद इसकी मूल मैकेनिकल मशीनरी, डायल और सुइयों को हटा दिया गया और इसे साधारण क्वार्ट्ज सिस्टम और फीके एल्यूमीनियम डायल से बदल दिया गया। जिस वजह से इसकी ऐतिहासिक पहचान लगभग खो सी गई थी। साल 2023 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) को मंदिर के संरक्षण कार्य के दौरान यह घड़ी मिली।
घड़ी को ठीक करने में लगे 96 लाख रुपये
मंदिर के संरक्षण का काम गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था (GNNSJ) को सौंपा गया था। मंदिर में काम के दौरान उन्हें यह घड़ी एक आधुनिक घड़ी के पीछे रखी हुई मिली। जिसके बाद SGPC की अनुमति लेकर इसे फिर से ठीक करने के लिए ब्रिटेन भेजा दिया गया था।

बता दें, ब्रिटेन के बर्मिंघम में विशेषज्ञों द्वारा करीब दो साल तक इस घड़ी का सुधार काम चला। इसमें गाड़ी ठीक करने के लिए लगभग 80 हजार पाउंड यानि 96 लाख रुपये की लागत लगी और यह अपने मूल स्वरूप को वापस आई। इसमें पीतल का नया डायल बनाया गया, रोमन अंकों के साथ सुइयां फिर से लगाई और मैकेनिकल प्रणाली को कार्यशील बनाया गया। घड़ी के सुधारने के बाद नवंबर के महीने में इसको भारत वापस लाया गया और जनवरी में उसी स्थान पर दोबारा स्थापित करने की योजना है।
एसजीपीसी का योगदान और भविष्य
एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी का मानना है कि ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण करना सिख संस्था का कर्तव्य है। इस घड़ी को वापस से वैसा बनाना और ठीक करना एक सराहनीय प्रयास है। अब यह घड़ी न केवल लोगों को समय बताने का कार्य करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को श्री दरबार साहिब से जुड़े इतिहास की याद भी दिलाती रहेगी।
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