Lakhimpur Kheri: उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने के तमाम सरकारी दावों के बीच लखीमपुर खीरी से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने न केवल जिला प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है, बल्कि समाज के उस भरोसे को भी तोड़ दिया है जो एक मरीज डॉक्टर पर करता है। धौरहरा क्षेत्र के माधोपुर गांव की रहने वाली एक युवती, प्राची वर्मा की मौत महज एक बीमारी से हुई मौत नहीं है, बल्कि यह जिला अस्पताल के उन सफेदपोश जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनहीनता और लापरवाही का परिणाम है, जिनकी रातें रजाई की गर्मी में कटती रहीं, जबकि वार्ड में एक बेटी अपनी आखिरी सांसों के लिए जद्दोजहद करती रही।
जब अस्पताल बना ‘डेथ चैंबर’
प्राची वर्मा को दो दिन पहले एक सामान्य उम्मीद के साथ जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था कि वह ठीक होकर अपने घर लौटेगी। शुरुआती दो दिन सब सामान्य था, लेकिन बीती रात अचानक उसकी हालत बिगड़ने लगी। परिजनों का आरोप है कि रात करीब 2:00 बजे से ही प्राची को सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी थी। बदहवास पिता और अन्य रिश्तेदार डॉक्टरों के केबिन की ओर दौड़े। वहां ड्यूटी पर तैनात कर्मियों ने उन्हें यह कहकर दुत्कार दिया कि “डॉक्टर साहब आराम कर रहे हैं, सुबह आना।” कड़ाके की ठंड में जब बाहर कोहरा गिर रहा था, अस्पताल के अंदर एक माँ का कलेजा अपनी बेटी की हालत देख फटा जा रहा था। परिजनों ने बार-बार गुहार लगाई, पैरों में गिरे, लेकिन रजाई तानकर सो रहे डॉक्टरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
Lakhimpur Kheri: अंतिम फोन कॉल: मामा, कोई नहीं आ रहा…
‘खबर इंडिया’ की विशेष पड़ताल में प्राची के मामा ने उस खौफनाक सुबह का जिक्र किया। सुबह के करीब 5:00 बजे थे, जब मोबाइल की घंटी बजी। दूसरी तरफ प्राची थी। उसकी आवाज में दर्द और बेबसी साफ झलक रही थी। उसने कहा “मामा, मेरी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो रही है, मम्मी-पापा बहुत देर से डॉक्टरों को बुला रहे हैं लेकिन कोई मुझे देखने नहीं आ रहा है। आप जल्दी आइए।” यह किसी मरीज की सामान्य शिकायत नहीं थी, यह एक अंतिम विदाई संदेश था। एक मरीज जो देख रहा था कि मौत उसके करीब खड़ी है और रक्षक कहे जाने वाले लोग बगल के कमरे में सो रहे हैं। इसके कुछ ही घंटों बाद प्राची की धड़कनें हमेशा के लिए खामोश हो गईं।
अस्पताल की काली हकीकत
जब खबर इंडिया के रिपोर्टर संजय कुमार राठौर ने मौके पर पहुँचकर जांच शुरू की, तो अस्पताल के दावों की पोल खुल गई। पड़ताल में सामने आया कि जिस समय प्राची की हालत गंभीर थी, उस समय वार्ड में कोई भी सीनियर डॉक्टर मौजूद नहीं था। परिजनों के चिल्लाने के बावजूद इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने कोई हरकत नहीं दिखाई। अस्पताल में गरीब मरीजों की जान की कीमत केवल तब तक है जब तक उनकी जेब में पैसे हैं या उनका कोई राजनीतिक रसूख है। पड़ताल के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखों में आंसू ला दिए। प्राची की माँ, जो अपनी जवान बेटी को खो चुकी थी, अचानक अपने पास रखे पैसे निकालने लगी और उन्हें अस्पताल के फर्श पर फेंकने लगी। वह चिल्ला रही थी— “तुम सबको पैसा ही चाहिए न? ये लो पैसे, जितना चाहिए उतना लूट लो, बस मेरी बेटी को एक बार जिंदा कर दो।” माँ का यह कृत्य उस भ्रष्ट तंत्र के लिए सबसे बड़ा तमाचा था जो इलाज के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं पूरी करता है। यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है और लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब सरकारी अस्पतालों में इलाज की नीलामी होगी?
Lakhimpur Kheri: स्वास्थ्य विभाग की लीपापोती
घटना के बाद से ही जिला अस्पताल के अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है। जब संजय कुमार राठौर ने मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) से सवाल करने की कोशिश की, तो हमेशा की तरह ‘कमेटी बनाकर जांच करने’ का रटा-रटाया जवाब मिला। सवाल यह है कि जब मरीज तड़प रहा था, तब कमेटी कहाँ थी? क्या जांच रिपोर्ट उस माँ की सूनी गोद को फिर से भर पाएगी? वहीं इस मामले में स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब लखीमपुर जिला अस्पताल में ऐसा हुआ हो। यहाँ के डॉक्टरों के लिए ड्यूटी सिर्फ एक औपचारिकता है। रात के समय यहाँ का नजारा किसी लावारिस सराय जैसा होता है जहाँ मरीज भगवान भरोसे रहता है।
प्राची की मौत ने पूरे धौरहरा और लखीमपुर में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अस्पताल के बाहर प्रदर्शन की चेतावनी दी है। लोगों का कहना है कि यदि 24 घंटे के भीतर उन डॉक्टरों पर FIR दर्ज नहीं की गई जो रजाई छोड़कर बाहर नहीं आए, तो वे सड़कों पर उतरेंगे।
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