Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश में चल रही SIR प्रक्रिया ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। चुनाव आयोग की नई व्यवस्था, जिसमें एक व्यक्ति सिर्फ एक ही जगह वोटर रह सकता है, शहरी इलाकों के लिए बड़ा झटका साबित हो रही है। शहरों में रहने वालों का बड़ा हिस्सा अपने पुश्तैनी गांव को ही मतदाता सूची में प्राथमिकता दे रहा है। जमीन, जायदाद, परिवार की सामाजिक पहचान और पंचायत चुनावों में सीधा हित इन सारे कारणों ने शहरी वोटरों को गांव की ओर झुकने पर मजबूर कर दिया है।
शहरों में SIR फॉर्म जमा नहीं, मतदाता सूची अचानक हल्की
इस बदलाव का प्रभाव शहरों में स्पष्ट नजर आने लगा है। लखनऊ, प्रयागराज, गाजियाबाद, नोएडा, कानपुर, मेरठ और आगरा जैसे बड़े शहरों में SIR फॉर्म बेहद कम जमा हुए हैं। हजारों-लाखों लोग जानबूझकर फॉर्म जमा नहीं कर रहे, ताकि उनका नाम गांव की वोटर लिस्ट में बना रहे। शहरों की मतदाता संख्या अचानक गिरने लगी है और अनुमान है कि लाखों नाम हट सकते हैं।
Uttar Pradesh News: ढाई करोड़ वोटर अब भी अनिश्चित क्यों नहीं लौटे फॉर्म?
प्रदेशभर में अब तक करीब 17–18% ही SIR फॉर्म वापस आए हैं। इसका मतलब है कि लगभग 2.45 करोड़ मतदाता अभी भी अपनी वोटिंग स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाए हैं। कई बड़े शहरों में दो-दो लाख से ज्यादा वोट कटने की संभावना जताई जा रही है। लखनऊ और प्रयागराज में सर्वाधिक असर दिख रहा है, जबकि गाजियाबाद और सहारनपुर जैसे शहर भी तेज गिरावट का सामना कर रहे हैं।
चुनाव आयोग का निर्देश एक ही जगह वोट और यहीं से कहानी बदल गई
जैसे ही आयोग ने स्पष्ट किया कि एक व्यक्ति शहर और गांव दोनों जगह नाम नहीं रख सकता, शहरी इलाकों में डुप्लीकेट वोट हटाने की कार्रवाई तेज हो गई। लोग अपने वास्तविक और स्थायी पते के आधार पर निर्णय लेने लगे। इसी निर्देश ने मतदाता सूची की सबसे बड़ी सफाई की शुरुआत कर दी, जो पिछले 20–25 वर्षों में शायद ही कभी देखने को मिली हो।
Uttar Pradesh News: पलायन बना सबसे बड़ा कारक
बड़े पैमाने पर पलायन भी इस संकट की जड़ में है। IT, शिक्षा, नौकरियों और फैक्ट्रियों के कारण लाखों लोग या तो UP के बाहर बस गए या अलग-अलग शहरों में शिफ्ट हो गए, लेकिन वोट अपने गांव में ही बचाए रखते थे। अब पहली बार उन्हें एक जगह चुनने पर मजबूर होना पड़ा, और वही मोड़ पूरे शहरी चुनावी गणित को उलझा गया।
BJP को शहरी सीटों पर झटका, चुनावी समीकरण बिगड़ने की आशंका
सबसे बड़ी चिंता बीजेपी के लिए दिख रही है, क्योंकि उसकी मजबूत पकड़ हमेशा से शहरी सीटों पर मानी जाती रही है। अब जब शहरों में ही लाखों नाम कटने के संकेत मिल रहे हैं, पार्टी के लिए यह स्थिति बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकती है। SIR प्रक्रिया में देरी, और इतने बड़े पैमाने पर फॉर्म न लौटने से यह अनुमान और मजबूत हो गया है कि शहरी वोटरों की संख्या चुनाव से पहले काफी घट सकती है।
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