LPG Gas Crisis: मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के बीच खुद को ‘शांतिदूत’ (Peace Broker) के रूप में पेश करने की पाकिस्तान की कोशिश को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की मध्यस्थता को खारिज कर दिया है, वहीं आर्थिक मोर्चे पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 3.5 अरब डॉलर की तत्काल वापसी का दबाव बनाकर इस्लामाबाद की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
इस्लामाबाद में बातचीत से ईरान का साफ इनकार
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने मध्यस्थों के जरिए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकारियों के साथ किसी भी प्रकार की वार्ता के लिए तैयार नहीं है। बताया जा रहा है कि अमेरिका द्वारा युद्धविराम के लिए रखी गई 15 शर्तों को ईरान ने पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। इसके जवाब में ईरान ने अपनी 5 शर्तें रखी हैं, जिन पर अमेरिका सहमत नहीं हुआ है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावनाएं फिलहाल ठप पड़ती नजर आ रही हैं। ईरान के इस सख्त रुख के बाद अब तुर्किए और मिस्र नए मध्यस्थ विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अब संभावित वार्ता के लिए कतर और इस्तांबुल जैसे स्थानों पर विचार किया जा रहा है, हालांकि सफलता को लेकर संशय बरकरार है।
LPG Gas Crisis: पाकिस्तान की कूटनीतिक साख पर सवाल
हाल ही में शहबाज शरीफ ने दावा किया था कि पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच “सार्थक और निर्णायक बातचीत” कराने को तैयार है और दोनों पक्षों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभा रहा है। लेकिन ईरान के इनकार के बाद पाकिस्तान की यह पहल कमजोर पड़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भरोसे की कमी के चलते ईरान, पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में कोई भूमिका देने के पक्ष में नहीं है। इससे क्षेत्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की विश्वसनीयता को झटका लगा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की कोशिशें ऐसे मोड़ पर पहुंच गई हैं, जहां से आगे बढ़ना बेहद मुश्किल माना जा रहा है। एक महीने से अधिक समय से जारी इस संघर्ष में दोनों पक्ष सार्वजनिक तौर पर शांति की बात कर रहे हैं, लेकिन शर्तों पर सहमति बनती नहीं दिख रही। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ओर ईरान को कड़ी चेतावनी दे चुके हैं, तो दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि ईरान का नेतृत्व युद्धविराम चाहता है। हालांकि, ईरान ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। कूटनीतिक असफलता के बीच पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा झटका लगा है। संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर की राशि तत्काल लौटाने का दबाव बनाया है। सूत्रों के अनुसार, इस महीने के अंत तक यह भुगतान किए जाने की संभावना है। इस रकम की वापसी से पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर करीब 18% तक असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तानी रुपये पर दबाव बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रम के तहत देश की आर्थिक स्थिति और जटिल हो सकती है।
दोनों की अर्थव्यवस्था पर असर
एक ओर मध्य पूर्व में जारी युद्ध और दूसरी ओर बढ़ता आर्थिक दबाव—इन दोनों के बीच पाकिस्तान की ‘पीस ब्रोकर’ बनने की कोशिश न केवल विफल होती दिख रही है, बल्कि उसे कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। ईरान का रुख फिलहाल स्पष्ट और सख्त है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ टकराव जारी है। ऐसे में क्षेत्र में शांति की राह फिलहाल दूर नजर आ रही है।
लेखक: अरुण चौरसिया
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