Modern Indian History: अब तक अक्सर कहा जाता रहा है कि ब्रिटेन का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। बात सही थी- दुनिया के हर कोने पर ब्रिटिश लोगों ने अपना साम्राज्य खड़ा कर दिया था। पूर्व हो या पश्चिम ; सब जगह व्यापार को अपने हाथों में उन्होंने लिया हुआ था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के साम्राज्य का पतन होता चला गया। इस पतन का कारण था, विश्व शक्ति की दो धुरियां खड़ी हो गई थी। एक का नेतृत्त्व अमेरिका कर रहा था और दूसरे का रूस। इसका कारण था कि इन दो देशों ने अपने अस्तित्त्व को बरकरार रखने के लिए अपने- अपने संगठन बनाए। रूस ने वार्सा पैक्ट के भीतर पूर्वी यूरोप को अपना दोस्त बनाया और उनके साथ सैनिक पैक्ट कर अपने अस्तित्त्व की रक्षा का केंद्र बनाया, उस दौर में जर्मनी के पूर्वी भाग पर रूस का कब्जा था, वह आसानी से यूरोप के पूर्वी हिस्से को खोना नहीं चाहता था। इसलिए जर्मनी के बीच में एक दीवार खड़ी की गई। दूसरी तरफ नाटो संगठन बना जिसका नाम था नार्थ अटलांटिक संगठन यानी नाटो इसमें यूरोप का पश्चिमी हिस्सा था, इसके नेतृत्त्व का असली जिम्मा अमेरिका के पास था। इन दो हिस्सों के कारण हर बार झगड़े होते थे, मगर खुल कर नहीं होते थे, इसलिए अपने व्यापार के अस्तित्त्व को बनाये रखने के लिए विश्व शीत युद्ध में उलझा।
कुछ ऐसे देश थे, जो अमेरिका और रूस के साथ सीधे सैनिक संधि करने को तैयार नहीं थे, वे स्वतंत्र रूप से अपने देश के विकास के लिए योजनाओं में व्यस्त थे, उन योजनाओं के चलाने के लिए, दोनों महा शक्तियों के सहयोग के साथ आगे बढ़ रहे थे। भारत ने विदेश नीति में गुट के खिलाफ एक संगठन बनाया, और उसका नाम दिया गुट निरपेक्ष देश; जिसमें ब्रिटिश शासन से मुक्त हुए देश शामिल हुए। विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद, सारे औपनिवेशिक देश अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका से लेकर अन्य स्थानों से एकत्र हुए। इन देशों ने भारत के नेतृत्त्व में गुटनिरपेक्ष देशों का संगठन बना कर, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम भूमिका निभाई। इस प्रकार विश्व मे एक संगठन शांति प्रिय देशों का बना।
लेकिन इसके बावजूद अमेरिेका अपने वर्चस्व की लड़ाई में आगे रहना चाहता था। विश्व युद्ध के बाद ऐसा ही रहा,। इसका मुख्य कारण विश्व व्यापार में अमेरिका अपने डालर का वर्चस्व नहीं खोना चाहता था। इसलिए अमेरिका की कोशिश हमेशा यही रही है। इसी लिए हाल ही में उसने वेनेजुएला के रष्ट्रपति को पद से हटाकर उसे वह बंदी बनाकर न्यूयार्क ले गया। यह काम हेनरी किसिंगर की तरह का था, जिसने 1974 में सऊदी अरब को इसी तरह सबक सिखाया। विदेश सचिव किसिंगर के इस कार्य ने अमेरिका को 50 वर्षों के लिए विश्व में पेट्र्ोडालर में व्यापार करना सुनिश्चित किया। अभी वेनेजुएला के पास रिर्जव में 300 अरब बैरल का भंडार है। इस भंडार को अमेरिका की कंपनियां अपने हाथों में रखना चाहती है। ताकि डालर की कीमत विश्व में बनी रहे। सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल यानी विश्व का खनिज तेल 20 प्रतिशत वेनेजुएला के पास है।
जैसा सर्वविदित है कि वेनेजुएला अपने तेल का व्यापार चीन के साथ येन में कर रहा है। 2018 में ही वेनेजुएला ने घोषित कर दिया था कि हम अपना व्यापार डालर से नहीं करेंगे। अमेरिका को यह रास नही आया, क्योंकि उसकी अर्थ व्यवस्था डालर से चल रही है। तेल के व्यापार में अमेरिका अपने हथियारों के द्वारा सभी देशों के साथ सुरक्षा देने का पैक्ट करता आया है। इसलिए विश्व का हर देश तेल को खरीदने के लिए डालर से ही तेल लेता है। जिस भी देश को तेल चाहिए, उसे डालर भी चाहिए। इस काम के लिए अमेरिका डालर को बड़े मुक्त भाव से छापता है। यानी अमेरिका की करंसी दुनिया में तेल के कारण ही जिंदा है।
2000 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम ने घोषणा की थी कि वह अपने तेल को यूरो में बेचेगा। इस कारण अमेरिका ने सद्दाम को सबक सिखाया और उसे हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। 2009 में गद्दाफी ने प्रस्ताव रखा था कि सोने के साथ अफ्रीकन करंसी का प्रचलन हो, लेकिन अमेरिका को यह नहीं जमा। इसके विरोध में लीबिया पर नाटो देशों ने 2011 में बम गिराये। इस तरह से गोल्ड दिनार उसके साथ ही मर गया। समय का चक्र भी देखिए 3 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला पर आक्रमण हुआ और राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार किया गया। ठीक 36 वर्ष पहले 3 जनवरी, 1990 में पनामा में ड्रग माफिया के कारणों का हवाला देकर नौरेगा को गिरफ्तार किया गया था।
अमेरिका अपने डालर की पकड़ को मजबूत करने के लिए नये-नये बहाने बनाकर कार्य करता है। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति का एक और बयान सामने आया है, इसमें ग्रीन लैंड को कब्जाने की बात कर रहा है। उनका मानना है कि डेनमार्क के पास ग्रीन लैंड है, और वह नाटो देश है, इसलिए उस पर अमेरिका अपना काम करना चाहता है। आज अमेरिका के राष्ट्रपति ने विश्व में अपने ऐक्सन से खलबली मचा रखी है। कोलम्बिया, क्यूबा और मैक्सिको को परेशान करने के लिए उतावला है। यदि ऐसे हालात और बने, तब विश्व पर युद्ध के बादल और मंडरायेंगे। अनिश्चितता के दौर में विश्व पहुंचेगा। भारत को भी परोक्ष रूप में धमकी देने से अमेरिका नहीं चूक रहा है। उसका संदेश साफ है कि यदि रूस से भारत तेल लेगा, तो उसे और टैरेफ देना पड़ेगा।
लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल
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