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North East: उत्तरी पूर्वी राज्य तीन हजार दो सौ करोड़ रुपये भी खर्च नहीं कर पाये!

North East: उत्तरी पूर्वी राज्य तीन हजार दो सौ करोड़ रुपये भी खर्च नहीं कर पाये!

North East: उत्तर पूर्वी राज्यों का तीन हजार दो सौ करोड़ रुपये का बजट इंतजार कर रहा है खर्च होने के लिए, लेकिन राज्यों की सरकारों को गम नहीं है विकास के रास्ते पर चलने के लिए। नई सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए नार्थ ईस्ट स्पेशल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम के तहत यह धनराशि रखी हुई थी। इस बात की जानकारी राज्य सभा के पटल पर केंद्रीय राज्यमंत्री सुकांता मजुमदार ने एक प्रश्न के उत्तर में दी। 31 दिसंबर 2025 तक 160 प्रोजेक्ट पर कर्य शुरू नहीं कर पाये।

सभी राज्यों में से असम टाप में है, इसके पास 1,012.9 करोड़ रुपये 35 प्रोजेक्ट के लिए पड़े हैं। मणिपुर 441.4 करोड़, नागालैंड 406.1 करोड़ और अरुणाचल प्रदेश 395.4 करोड़,। इस प्रकार यह राज्य हैं जिनको भुगतान नहीं हुआ, पर निधि जमा है- त्रिपुरा 308.7 करोड़, मिजोरम 275.8 करोड़, मेघालय 258 करोड़ और सिक्किम107.9 करोड़ रुपये।

विकास की ऐसी दशा का पता तब चला, जब पूछताछ हुई है। यह देश के एक छोटे हिस्से के विकास की राह का नजारा है। यदि हम पूरे देश के विकास की स्थिति को देखें, जिनकी छानबीन नहीं हुई है, तो ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल सकते हैं। दिल्ली राजधानी को ही देख लीजिए- यहां पर जो विकास होना था, वह सही मायने में दिखता नहीं है। सड़कें टूटी पड़ी हैं, तो वैसे ही चल रही हैं। बड़़े-बड़े गड्ढे महीनों से जस के तस हैं। विकसित कालोनी वसंत कुंज को ही देख लीजिए 26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्व के दौरान सड़कों पर स्ट्रीट लाइट होनी चाहिए थी, पर वह सड़के अंधेरा झेल रही थीं, एक ही दिन नहीं, पूरे पखवाड़े लोग झेलते रहे। वैसे ही पैदल चलने वालों और अपंगों के लिए वह ट्रैक नहीं बने हैं, जिसकी उनको जरूरत है। यही ही नहीं किसी मरीज को जल्दी से अस्पताल पहुुंचाना हो, तो उसके लिए ट्रैफिक से हटकर जाने के लिए रास्ते ही नहीं बने हैं।

यानी आपातकालीन सेवाओं का भी ध्यान नहीं रखा गया है। थोड़ा सा बारिश हो जाए, तो नालांे से पानी आगे न जाकर तालाब में बदल जाते है, बहुत सारी जगहें ऐसी हैं, जिनका हल दिल्ली सरकार अभी तक नहीं कर पाईं, यह तो विकसित दिल्ली की बात हो रही है। यदि देश के उन हिस्सों की बात करें, जो पूरी तरह से विकास के लिए तरस रहे हैं, वहां अधिकारी भी जाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। तब योजनाओं पर काम होगा कैसे ? अक्सर चुनावी नारों में ही विकास दब जाता है। इस पर प्रशासन को सोचना चाहिए, सोचना ही नहीं काम करके दिखाना भी चाहिए।

लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल

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