Parliament Dignity Debate: संसद का बजट सत्र चल रहा है। इस सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए रविवार का दिन भी रखा गया। ऐसा लगा कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए रविवार का दिन भी जरूरी है। लेकिन आज सत्र का पांचवां दिन चल रहा है, फिर भी रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले मजबूत नहीं हो पा रही है। रविवार भी व्यर्थ चला गया। संसद में कोई विशेष रचनात्मक कार्य होता दिखाई नहीं दे रहा है। एक-दूसरे पर तू-तू, मैं-मैं ने संसद की गरिमा को समाप्त कर दिया है।
आजादी के बाद, आज़ाद भारत के कानून बनाने वाले सांसद संसद में ऐसी स्थिति पैदा करेंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी। यह सब वर्तमान पीढ़ी देख रही है और आने वाली पीढ़ी इसका इतिहास पढ़ेगी कि हमारे सांसद संसद को रचनात्मक रूप देने में कितने सक्षम थे। देश की सर्वोच्च पंचायत यानी संसद को चलाने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को अपने विचार रखने का अवसर मिलता है। इन्हीं विचारों के आधार पर कानून बनते हैं और नीतियों का निर्माण होता है। यही तो इस मंच का उद्देश्य है कि एक-दूसरे के विचारों का समायोजन कर ठोस और स्थायी निर्माण के लिए देश को मजबूती दी जाए। लेकिन दुर्भाग्यवश, संसद में अब रचनात्मक विचारों के लिए जगह ही नहीं बची है।

इसी संदर्भ में यदि हम देखें, तो राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद सांसदों से उस पर प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहती है। वास्तव में राष्ट्रपति जो भी भाषण देते या देती हैं, वह सरकार द्वारा किए गए कार्यों और आगामी योजनाओं का लेखा-जोखा होता है। इसमें राष्ट्रपति की व्यक्तिगत समझ नहीं, बल्कि सरकार यानी मंत्रिपरिषद की सामूहिक समझ शामिल होती है यह बात ध्यान देने योग्य है। सदन का नेता, यानी प्रधानमंत्री भी केवल अपनी व्यक्तिगत राय नहीं रख सकता, विशेषकर सरकार की नीतियों के विषय में। इन नीतियों पर पूरे मंत्रिपरिषद की सहमति आवश्यक होती है। वही सहमति राष्ट्रपति के माध्यम से सदन के समक्ष रखी जाती है।
संवैधानिक नेताओं की भूमिका
संविधान निर्माताओं ने देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए ये प्रावधान किए हैं। इसी कारण भारत का संविधान लोकतंत्र को चलाने का सबसे बड़ा औजार है। परंपराओं पर आधारित न होकर भारत का संविधान लिखित है, यही इसकी विशेषता है। इसी कारण संसद में दो प्रमुख नेता होते हैं—एक पक्ष का नेता, जिसके पास सदन में बहुमत होता है और वह मंत्रिपरिषद का गठन करता है। लेकिन संवैधानिक दायरे में रहते हुए वह अकेले देश की नीतियां नहीं बना सकता; उसे मंत्रिपरिषद की सहमति लेनी अनिवार्य होती है। दूसरा नेता विपक्ष का होता है। यह मानकर चला जाता है कि वह ‘शैडो कैबिनेट’ बनाकर सरकार की नीतियों पर अपनी स्वतंत्र राय सदन में रखेगा। इससे सरकार को सलाह मिलती है और गलत रास्ते से सही दिशा में लौटने का अवसर मिलता है। इसी व्यवस्था के कारण देश में ठोस नीतियों का निर्माण संभव हो पाता है। इन्हीं कारणों से भारत के संविधान की अपनी गरिमा है। हमारा संविधान विश्व के अनेक संविधानों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, इसलिए इसमें त्रुटियों की संभावना बहुत कम है।
Parliament Dignity Debate: संसद में सुरक्षा मुद्दे उठाए गए
लेकिन आजकल संसद में जो घटनाएं हो रही हैं, वे प्रशंसा के योग्य नहीं हैं। विपक्ष का नेता जब किसी मुद्दे को उठाता है विशेषकर देश की सुरक्षा से जुड़े विषय पर तो वह मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों के आधार पर करता है। जिन पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे को देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने अपने संस्मरणों की पुस्तक में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया है, जब उन्हें दुश्मन के खिलाफ सेना को कार्रवाई का आदेश देने की आवश्यकता थी, लेकिन समय पर आदेश देने से रोका गया। इसके कारण सेना को दुश्मन के विरुद्ध हथियार न चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी संदर्भ को विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद में उठाया। उनका उद्देश्य सरकार को आदेश देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए सलाह देना था कि भविष्य में देश की सुरक्षा से जुड़े ऐसे क्षण दोबारा न आएं। यही तो विपक्ष की भूमिका है और यही लोकतंत्र को मजबूत करने का मार्ग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझना चाहिए कि नेता प्रतिपक्ष की भूमिका लोकतांत्रिक रूप से सही है और वह सरकार को भविष्य की गलतियों से सावधान करने का प्रयास कर रहा है।
Report By: भगवती प्रसाद डोभाल






