Salim Wastik: देश के अलग-अलग हिस्सों से आई दो घटनाएं केवल खबर नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज के भीतर पनप रहे तनाव और अविश्वास की परतें खोलती हैं। एक मामला कोटद्वार का है, जहां 26 जनवरी के दिन एक दुकान के नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया। दूसरा मामला गाजियाबाद के लोनी का है, जहां धार्मिक मुद्दों पर मुखर रहने वाले यूट्यूबर सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला हुआ है। दोनों घटनाएं अलग हैं, लेकिन समाज के लिए एक ही सवाल छोड़ती हैं क्या अब नाम और विचार भी ‘अपराध’ बनते जा रहे हैं?
‘बाबा’ नाम पर पहचान की परीक्षा
कोटद्वार में ‘बाबा स्कूल गारमेंट्स’ नाम की दुकान पर कुछ हिंदूवादी संगठनों ने आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि ‘बाबा’ शब्द हिंदू आस्था से जुड़ा है और शहर के प्रसिद्ध सिद्धबली मंदिर से भावनात्मक संबंध रखता है। इसलिए मुस्लिम दुकानदार इस नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता। विवाद तब और गहरा गया जब दुकानदार दीपक कुमार ने खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा पहचान, धर्म और व्यवसाय की स्वतंत्रता से जुड़ गया। सवाल उठने लगे—क्या किसी नाम पर किसी एक समुदाय का अधिकार हो सकता है? क्या ‘बाबा’, ‘राम’, ‘अली’ या ‘नूर’ जैसे शब्द अब केवल धार्मिक खांचे में बांध दिए जाएंगे? यह विवाद केवल एक बोर्ड बदलने या न बदलने का नहीं था, बल्कि इसने समाज के उस मनोविज्ञान को उजागर किया, जहां नाम से पहले धर्म पढ़ा जाने लगा है।
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Salim Wastik: लोनी में विचारों की कीमत खून से?
दूसरी ओर लोनी में सलीम वास्तिक पर हुआ हमला और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ‘एक्स मुस्लिम’ के तौर पर पहचान बनाने वाले सलीम अपने यूट्यूब चैनल ‘सलीम वास्तिक 0007’ पर इस्लाम, मदरसा शिक्षा, हलाला और मुस्लिम समाज की स्थिति जैसे विषयों पर खुलकर बोलते रहे हैं। जहां बीते जुमे के दिन उनके कार्यालय में घुसकर अज्ञात हमलावरों ने चाकुओं से हमला कर दिया। गंभीर हालत में उन्हें दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां उनका इलाज चल रहा है। मामले में पुलिस जांच कर रही है, लेकिन समाज के भीतर उठता सवाल यह है क्या असहमति का जवाब हिंसा हो सकता है? किसी भी लोकतंत्र में विचारों से असहमति होना स्वाभाविक है। लेकिन यदि जवाब बहस या कानून की जगह चाकू से दिया जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी प्रहार है।
राजनीति की चुप्पी और समाज की जिम्मेदारी
ऐसे मामलों में अक्सर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो जाती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह जैसे नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द की बात करते रहे हैं। लेकिन असली चुनौती बयान देने से आगे बढ़कर जमीनी भरोसा बहाल करने की है। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस वक्त मोहम्मद दीपक को लेकर बयान बाजी अपने चरम पर थी उस दौरान राहुल गांधी और संजय सिंह जैसे तमाम नेताओं ने छाती पीट-पीट कर उनका समर्थन किया था लेकिन आज जब गाजियाबाद के रहने वाले सलीम वास्तिक पर हमला होता है तो यह लोग ना जाने कहां छिप जाते हैं। जिसके बाद अब समाज को यह तय करना होगा कि वह नाम और पहचान के आधार पर विभाजन चाहता है या सहअस्तित्व। क्या हम इतने असुरक्षित हो गए हैं कि एक दुकान का नाम हमें आहत कर देता है? क्या किसी की वैचारिक असहमतिहमें हिंसक बना सकती है?

Salim Wastik: दोनों घटनाओं का साझा बिंदु ‘डर’
दोनों घटनाओं का साझा बिंदु ‘डर’ है। कोटद्वार में दुकानदार को यह सफाई देनी पड़ती है कि वह कौन है। लोनी में एक यूट्यूबर को अपने विचारों की कीमत खून से चुकानी पड़ती है। यह डर केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि समाज की उस मानसिकता का संकेत है, जहां संवाद की जगह संदेह और आक्रोश ले रहे हैं। भारत की ताकत उसकी विविधता रही है यहां नामों का मेल भी है और विचारों का टकराव भी। लेकिन टकराव को हिंसा में बदलने देना किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक संकेत है। आज जरूरत है कि कानून सख्ती से अपना काम करे, दोषियों को सजा मिले और साथ ही समाज भी आत्ममंथन करे। क्योंकि अगर नाम और विचार दोनों ही ‘खतरा’ बन जाएं, तो अगला निशाना कौन होगा यह कोई नहीं जानता।
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