West Bengal: बांग्लादेश की जेल में चार महीने से अधिक समय तक बंद रहने के बाद आज बुधवार को 47 भारतीय मछुआरे अंततः स्वदेश लौट आए। दोपहर में उन्हें पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले स्थित फ्रेजरगंज मत्स्य बंदरगाह पर लाया गया, जहाँ उनके परिजनों और स्थानीय प्रशासन ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। लंबे समय बाद अपनों को देखकर कई परिवारों की आँखें खुशी से नम हो उठीं।
कैसे हुई थी गिरफ्तारी?
करीब चार महीने पहले भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा का उल्लंघन करने के आरोप में बांग्लादेश नौसेना ने तीन भारतीय ट्रॉलर समेत कुल 48 भारतीय मछुआरों को हिरासत में लिया था। उनके खिलाफ समुद्री क्षेत्र में अवैध प्रवेश के मामले दर्ज किए गए और उन्हें जेल भेज दिया गया। इस दौरान मछुआरों में से एक, दक्षिण 24 परगना के निवासी बाबुल दास, की बांग्लादेश की जेल में ही मौत हो गई थी। इस घटना ने भारत में उनके परिवार और मछुआरा समुदाय को गहरे शोक में डाल दिया था।
West Bengal: कूटनीतिक पहल से खुला रास्ता
दोनों देशों की सरकारों के बीच हाल के हफ्तों में हुई कूटनीतिक बातचीत और विदेश मंत्रालयों के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद इन भारतीय मछुआरों की रिहाई संभव हो पाई। भारत ने सद्भावना के रूप में 32 बांग्लादेशी मछुआरों को रिहा किया था। इसके बाद पारस्परिक सहयोग के तहत बांग्लादेश सरकार ने भी भारतीय मछुआरों को छोड़ने का निर्णय लिया। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा पर दोनों देशों के तटरक्षक बलों की मौजूदगी में भारतीय और बांग्लादेशी मछुआरों का औपचारिक आदान–प्रदान किया गया। सभी 47 भारतीय मछुआरे मुख्य रूप से काकद्वीप और आसपास के तटीय इलाकों के निवासी बताए जा रहे हैं।
फ्रेजरगंज में भावनात्मक पल
फ्रेजरगंज बंदरगाह में इन मछुआरों के स्वागत के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और अधिकारी मौजूद थे। इस मौके पर सुंदरबन विकास मंत्री बंकिमचंद्र हज़रा, काकद्वीप के विधायक मोंटुराम पाखिरा, भारतीय तटरक्षक बल के फ्रेजरगंज स्टेशन के अधिकारी, काकद्वीप महकुमा प्रशासन और सुंदरबन पुलिस जिले के अधिकारी उपस्थित रहे। औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी मछुआरों को सुरक्षित रूप से उनके परिजनों के हवाले कर दिया गया।
West Bengal: परिवारों में खुशी की लहर
लंबे समय से अपने परिवार से दूर रहने के बाद इन मछुआरों की घर वापसी ने स्थानीय समुदायों में भी राहत और खुशी का माहौल बनाया है। कई परिवारों ने बताया कि चार महीने से वे लगातार चिंता में थे और बच्चों व बुजुर्गों की आँखें अपने अपनों को देखने के लिए रोज़ दरवाजे की ओर लगी रहती थीं।
Report By: Pijush
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