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ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव पर प्रक्रिया का होगा पालन, बोले ओम बिरला

Gyanesh Kumar:

Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की विपक्ष की मांग के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है, तो उस पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। बिरला ने स्पष्ट किया कि इस मामले में वही प्रक्रिया अपनाई जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए निर्धारित है। वहीं, परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का फैसला सरकार को करना है।

Gyanesh Kumar: ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की तैयारी में विपक्ष-

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले भी विपक्ष ने लोकसभा और राज्यसभा में इस संबंध में नोटिस दिया था। यह नोटिस 12 मार्च को दिया गया था, जिस पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। हालांकि, इस नोटिस को खारिज कर दिया गया था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि नोटिस खारिज करने का कोई कारण नहीं बताया गया। अब एक बार फिर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा है कि प्रस्ताव आने पर नियमों के अनुसार फैसला किया जाएगा।

Gyanesh Kumar: परिसीमन और महिला आरक्षण पर विशेष सत्र बुलाने का फैसला सरकार के हाथ में-

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने का फैसला सरकार को करना है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद के सत्र को लंबे समय तक स्थगित रखने के उदाहरण पहले भी सामने आए हैं। दरअसल, संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था, लेकिन अब तक सत्रावसान नहीं हुआ है। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के मुताबिक, तकनीकी रूप से संसद का सत्र अभी भी जारी है। ऐसे में सदन की बैठक दोबारा बुलाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

संसद की बैठक से पहले 3 से 7 दिन का नोटिस दे सकते हैं स्पीकर-

लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, संसद की बैठक दोबारा बुलाने के लिए किसी नोटिस की अनिवार्यता नहीं है। हालांकि, सांसदों को अपनी तैयारियां करने और कार्यक्रम तय करने के लिए पर्याप्त समय देने के उद्देश्य से लोकसभा अध्यक्ष बैठक से पहले तीन से सात दिन का नोटिस दे सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि यदि संसद की बैठक दोबारा होती है, तो इसे विशेष सत्र या पिछले सत्र की निरंतरता के रूप में आयोजित किया जा सकता है। वहीं, संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने के लिए 14 दिन का नोटिस देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है। हालांकि, आमतौर पर सांसदों को प्रश्नकाल के लिए नोटिस देने का पर्याप्त समय उपलब्ध कराने के लिए ऐसा किया जाता है।

दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता-

संसद के विशेष सत्र के तुरंत बाद शीतकालीन सत्र बुलाने पर भी कोई संवैधानिक रोक नहीं है। संविधान के अनुसार, संसद के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। ऐसे में सरकार अपनी जरूरत और परिस्थितियों के अनुसार संसद की बैठक बुलाने का फैसला कर सकती है।

किरेन रीजीजू ने मल्लिकार्जुन खरगे को लिखा पत्र-

इस बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने बताया कि सरकार डीएमके, समाजवादी पार्टी, शिवसेना (यूबीटी) और बीजू जनता दल के संपर्क में है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार कर रही है। हालांकि, सत्र बुलाने से पहले सरकार दो-तिहाई बहुमत को लेकर आश्वस्त होना चाहती है। इसके अलावा, सरकार संसद के विशेष सत्र पर फैसला लेते समय 26 और 27 अक्टूबर को होने वाले ब्रिक्स संसदीय फोरम को भी ध्यान में रखेगी। ऐसे में आने वाले दिनों में विशेष सत्र को लेकर सरकार की रणनीति पर सबकी नजरें रहेंगी।

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