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जेल से बाहर आते ही सौरव-आशुतोष को क्राइम ब्रांच का बुलावा, क्या कानूनी शिकंजे में फंस गए CJP नेता?

CJP नेताओं की रिहाई के बाद भी मुश्किलें बरकरार
CJP नेताओं की रिहाई के बाद भी मुश्किलें बरकरार

CJP Legal Troubles: सौरव दास और आशुतोष रांका 21 अक्टूबर की रात तिहाड़ जेल से रिहा हो गए। हालांकि, रिहाई के अगले ही दिन 22 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दोनों को जांच में शामिल होने के लिए समन भेज दिया। दोनों ने इसके लिए और समय मांगा है। वहीं, 23 अक्टूबर को उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश होना है। इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ऐलान किया है कि दिवाली तक पार्टी की ओर से कोई प्रदर्शन या आंदोलन नहीं किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि CJP के नेता कानूनी मामलों में कैसे उलझ गए और क्या इन मुश्किलों के कारण दिल्ली में बड़े प्रदर्शन करना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा?

CJP Legal Troubles: CJP नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कैसे शुरू हुई?

CJP ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। इसी दौरान पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को फ्लाइट के अंदर ही हिरासत में ले लिया गया। दरअसल, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 126 और 170 के तहत पुलिस को कुछ परिस्थितियों में अपराध होने से पहले ही एहतियातन हिरासत में लेने का अधिकार है। इसे प्रिवेंटिव कस्टडी कहा जाता है। अगले दिन दिल्ली कैंट के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने तीनों को 50 हजार रुपये के सिक्योरिटी बॉन्ड भरवाने के बाद रिहा कर दिया। उन्हें एक साल तक शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करने और अच्छा आचरण बनाए रखने की शर्त दी गई थी।

जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने के बाद दोबारा हिरासत

13 अक्टूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के विरोध में सौरव और आशुतोष वहां पहुंचे और तिरंगा लहराया। इस मामले में SEM कोर्ट के मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा ने दोनों को न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों ने पीस बॉन्ड की शर्तों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है। सौरव और आशुतोष की हिरासत के विरोध में CJP ने 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ रैली आयोजित की। इस दौरान अभिजीत दीपके को उनके घर से हिरासत में लिया गया। अगले दिन मार्ग थाने में SEM ने 50 हजार रुपये के बॉन्ड पर उन्हें रिहा कर दिया।

CJP Legal Troubles: 50-50 हजार रुपये के बॉन्ड पर मिली रिहाई

21 अक्टूबर की शाम SEM रितु राज ने सौरव और आशुतोष को भी 50-50 हजार रुपये के निजी बॉन्ड और सिक्योरिटी बॉन्ड पर रिहा कर दिया। हालांकि, दोनों को लिखित में यह शर्त देनी पड़ी कि जब तक जंतर-मंतर को कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किया जाता, तब तक वे वहां प्रदर्शन नहीं बुलाएंगे। साथ ही, उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर ही किसी भी प्रदर्शन में शामिल होने का वादा किया। 19 अक्टूबर को सौरव और आशुतोष SEM कोर्ट में सुनवाई के लिए पहुंचे थे।

CJP Legal Troubles: CJP नेताओं की रिहाई के बाद भी मुश्किलें बरकरार
CJP नेताओं की रिहाई के बाद भी मुश्किलें बरकरार
क्राइम ब्रांच ने दर्ज की गई FIR की जांच शुरू की

जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने के मामले में पुलिस ने सौरव और आशुतोष के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की हैं। इनमें सरकारी आदेश का पालन नहीं करने, अनधिकृत प्रवेश और आपराधिक साजिश जैसे आरोप शामिल हैं। दोनों मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई है। 22 अक्टूबर को क्राइम ब्रांच ने आशुतोष, सौरव और CJP के एक अन्य नेता अजिंक्य शिंदे को बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया। वहीं, 17 अक्टूबर को रिहाई के बाद अभिजीत दीपके भी सामने आए थे।

CJP Legal Troubles: हाई कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

18 अक्टूबर को सौरव और आशुतोष की हिरासत के पांचवें दिन दोपहर 12 बजे SEM के सामने सुनवाई होनी थी। हालांकि, SEM महेश कुमार मीणा ने कहा कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं। अगले दिन SEM रितु राज ने सुनवाई की और दोनों की हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी। CJP की लीगल सेल की प्रमुख रत्ना सिंह ने आरोप लगाया कि सुनवाई में जानबूझकर देरी की गई और दोनों के जमानतदारों को खारिज कर दिया गया।इसके बाद 20 अक्टूबर की रात सौरव और आशुतोष ने SEM के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। हालांकि, जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं की ओर से पहले दिए गए पीस बॉन्ड की शर्तें तोड़ने पर भी नाराजगी जताई। इसके बाद दोनों के वकील अभिक चिमनी ने हाई कोर्ट से याचिकाएं वापस ले लीं। फिलहाल मामले की सुनवाई SEM कोर्ट में ही होगी। अदालत ने दोनों को जमानत पर रिहा किया है, आरोपों से बरी नहीं किया है। 23 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे दोनों को अपने जमानतियों के साथ SEM के सामने पेश होना है। पुलिस जमानतियों का सत्यापन करके रिपोर्ट कोर्ट में सौंपेगी।

पीस बॉन्ड क्या है और इसकी शर्तें तोड़ने पर क्या होगा?

CJP नेताओं ने पीस बॉन्ड में शांति बनाए रखने और संविधान के दायरे में रहकर प्रदर्शन करने का वादा किया है। पीस बॉन्ड एक कानूनी वचन होता है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को शांति बनाए रखने, अपराध से दूर रहने और जरूरत पड़ने पर अदालत में पेश होने जैसी शर्तों का पालन करना होता है। अदालत किसी व्यक्ति को रिहा करते समय जमानती बॉन्ड या निजी बॉन्ड भरने के लिए कह सकती है।जमानती बॉन्ड में कोई दूसरा व्यक्ति आरोपी की ओर से गारंटी देता है कि वह अदालत की अगली सुनवाई में पेश होगा और जमानत की शर्तों का पालन करेगा। यदि शर्तों का उल्लंघन होता है, तो जमानतदार को अदालत की ओर से तय रकम चुकानी पड़ सकती है। वहीं, निजी बॉन्ड में व्यक्ति खुद लिखित रूप से शर्तों का पालन करने का वादा करता है। इसमें किसी जमानतदार की जरूरत नहीं होती, हालांकि अदालत इसमें भी एक निश्चित रकम तय कर सकती है।

CJP Legal Troubles: BNS में पीस बॉन्ड से जुड़े क्या प्रावधान हैं?

भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अध्याय 9 में शांति बनाए रखने से जुड़े प्रावधान हैं। इनके तहत, यदि अदालत को लगता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों से सार्वजनिक स्थान पर शांति भंग हो सकती है, तो उससे अधिकतम एक साल तक शांति बनाए रखने का लिखित वादा लिया जा सकता है। पीस बॉन्ड भरने से इनकार करने पर व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है और उसे तब तक न्यायिक हिरासत में रखा जा सकता है, जब तक वह बॉन्ड भरने के लिए तैयार न हो जाए या मामले की जांच पूरी न हो जाए। जांच पूरी करने की अधिकतम समयसीमा छह महीने बताई गई है।

यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि पीस बॉन्ड भरने के बावजूद व्यक्ति ने शांति बनाए रखने की शर्त का पालन नहीं किया, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और बॉन्ड की बाकी अवधि के लिए जेल भेजने का आदेश दिया जा सकता है। पुलिस भी कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है।सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, 11 अक्टूबर को जब पहली बार CJP नेताओं से पीस बॉन्ड भरवाया गया था, तब शांति बनाए रखने के साथ-साथ अच्छे आचरण की शर्त भी रखी गई थी। अच्छे आचरण का दायरा व्यापक होता है। ऐसे में पुलिस की हिरासत और कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ CJP नेताओं की ओर से दिए गए बयानों को भी इस शर्त के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है।

प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति क्यों है अहम?

आशुतोष रांका और सौरव दास ने SEM कोर्ट में दिए पीस बॉन्ड में संविधान के दायरे में रहकर प्रदर्शन करने का वादा किया है। हालांकि, आगे होने वाले प्रदर्शनों की अनुमति, प्रदर्शन के दौरान गड़बड़ी की शिकायत, हिरासत और मामले की सुनवाई की प्रक्रिया में दिल्ली पुलिस की भूमिका अहम होगी। इसकी एक वजह यह है कि दिल्ली में असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (ACP) रैंक के अधिकारियों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी गई हैं।न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका का हिस्सा होते हैं, जबकि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सरकार और प्रशासन के अधीन काम करते हैं। सौरव और आशुतोष के मामले की सुनवाई कर रहीं रितु राज दिल्ली पुलिस में ACP हैं। इस व्यवस्था को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट वर्ष 2018 में चिंता जता चुका है। उस समय शांति भंग की आशंका से जुड़ी धारा 107 और अपराध होने से पहले गिरफ्तारी से संबंधित धारा 151 भारतीय दंड संहिता (IPC) में थीं। अब इनके संबंधित प्रावधान भारतीय न्याय संहिता में धारा 126 और 170 के तहत आते हैं।

CJP Legal Troubles: हाई कोर्ट ने हिरासत के आंकड़ों पर जताई थी चिंता

दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2018 में इससे जुड़े आंकड़े पेश किए थे। इनके मुताबिक, जुलाई 2017 से 13 जून 2018 के बीच दिल्ली में इन धाराओं के तहत 23,012 लोगों को हिरासत में लिया गया था। इनमें से 7,335 लोगों को जेल भेजा गया, जबकि 1,119 लोगों को सात दिनों से ज्यादा समय तक जेल में रखा गया।इसके बाद हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि एहतियातन हिरासत से जुड़े प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति को एक बार में सात दिनों से ज्यादा समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। SEM को हर सप्ताह हिरासत की समीक्षा करनी होगी। साथ ही, उन्हें पुराने आदेशों की नकल करके फैसले देने के बजाय हर मामले के तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का विकल्प अब भी खुला

वर्ष 2008 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी कहा था कि बिना किसी ठोस वजह के केवल शांति भंग होने की आशंका जताकर लोगों को जेल भेजना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। उस मामले में अदालत ने हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को मुआवजा देने का आदेश दिया था।इस तरह CJP के सामने कानूनी दायरे में रहकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का विकल्प अब भी मौजूद है। हालांकि, पार्टी के नेताओं को पीस बॉन्ड की शर्तों, प्रदर्शन से जुड़े नियमों और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में उनके खिलाफ आगे भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।