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सड़क पर संसद और रामलीला मैदान में रैली, क्या INDIA गठबंधन कोई बड़ा निर्णय ले सकेगा? 

Opinion: सड़क पर संसद और रामलीला मैदान में रैली, क्या INDIA गठबंधन कोई बड़ा निर्णय ले सकेगा? 
Opinion: सड़क पर संसद और रामलीला मैदान में रैली, क्या INDIA गठबंधन कोई बड़ा निर्णय ले सकेगा? 

Opinion: इंडिया गठबंधन के सभी प्रमुख विपक्षी दल इन दिनों कथित ‘वोट चोरी’ और चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में गड़बड़ी के मुद्दों पर मुखर हैं। इस क्रम में 31 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘जन महाभियोग’ लाया गया, तो 1 नवंबर को रामलीला मैदान में रैली का आयोजन किया जा रहा है।INDIA गठबंधन का मानना रहा है कि जब संसद के भीतर मुद्दों पर बहस का मौका न मिले या सरकार उनकी बात न सुने, तो जनता के बीच जाकर आवाज उठाना जरूरी हो जाता है।दिलचस्प यह है कि इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को चुनौती दी है कि वे संसद के विशेष सत्र में उन मुद्दों पर खुलकर बहस करें, जिन्हें लेकर वे सड़कों पर हंगामा कर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को चुनौती दी कि वे अपने आरोप लेकर संसद आएं, सरकार इस पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है।

गृहमंत्री की चुनौती स्वीकार करेगा विपक्ष?

गृहमंत्री ने तो यहां तक कहा दिया है कि विपक्ष चर्चा से बचना चाहता है और संसद में बहस करने के बजाय केवल सड़कों पर हंगामा और ड्रामा करना चाहता है।एक तरह से उन्होंने गेंद इंडिया गठबंधन के पाले में डाल दी है। अब यह इंडिया गठबंधन के नेताओं की रणनीति पर निर्भर करता है कि वे गृहमंत्री की इस चुनौती को स्वीकार करते हैं या फिर खारिज करते हैं। अगर वे इस चुनौती को स्वीकार करते हैं, तो निश्चित ही जनता में यह संदेश जाएगा कि वे अपने मुद्दों पर गंभीर हैं, लेकिन यदि नहीं तो फिर गृहमंत्री अमित शाह की चुनौती दमदार मानी जाएगी। सवाल उठ सकते हैं कि जब सरकार सदन के विशेष सत्र में चर्चा के लिए तैयार है, तो विपक्ष क्यों कतरा रहा है? कायदे से खुद विपक्ष को विशेष सत्र बुलाने की मांग नहीं करनी चाहिए थी। ठीक है कि विपक्ष ‘सड़क पर संसद’ कार्यक्रम के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त  के खिलाफ ‘जन महाभियोग’ ले आया, लेकिन सवाल यह है कि ‘जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा’? आम जनता को यह संसद कितना प्रभावित कर पाएगी? सदन की कार्यवाही तो लोग बड़ी दिलचस्पी और गंभीरता से देखते हैं। सदन में विपक्ष अपने मुद्दों को मुखर और तार्किक ढंग से उठाए तो जनता में इसका व्यापक प्रभाव होगा।अब देखना है कि विपक्ष के रणनीतिकार गृहमंत्री की चुनौती के बारे में क्या सोचते हैं?  

Opinion: जब 106 विपक्षी सांसदों ने दिया सामूहिक इस्तीफा 

सवाल यह भी है कि कथित वोट चोरी और SIR में अनियमितताओं के मुद्दे पर विपक्षी दलों का ‘इंडिया गठबंधन’ (INDIA BLOCK) एकजुट तो दिखाई दे रहा है, लेकिन यह एकजुटता किसी बड़े निर्णय को लेकर भी दिखाई देगी या नहीं? क्या विपक्षी दल सरकार पर दबाव बनाने के लिए और जन विश्वास हासिल करने के लिए कोई बड़ा दांव चलने का साहस दिखा पाएंगे? क्या विपक्षी दल सामूहिक स्वर में कह पाएंगे कि जब तक उनकी आवाज नहीं सुनी जाती, तब तक वे किसी भी चुनाव का विरोध करेंगे? जब दृढ़ विश्वास हो कि चुनाव में धांधली निश्चित है, तो फिर ऐसा चुनाव क्या हारने के लिए लड़ा जाना चाहिए? विपक्षी दलों को अतीत में झांककर देखना चाहिए कि सरकार पर दबाव कैसे बनाया जाता है? 24 जून 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के इस्तीफे की मांग को लेकर 106 विपक्षी सांसदों ने लोकसभा से सामूहिक इस्तीफा दे दिया था।इन सांसदों की नाराजगी विवादास्पद बोफोर्स (Bofors) तोप सौदे को लेकर थी।इन सांसदों ने कहा कि जब संसद में विपक्ष की आवाज नहीं सुनी जाती है, तब सीधे जनता के बीच जाना चाहिए।सांसदों ने जो सामूहिक निर्णय लिया उसका इतना व्यापक संदेश गया कि उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी सत्ता मेें नहीं लौट पाए थे।