Lakhimpur Kheri: तराई का यह इलाका अपने घने जंगलों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। खासकर बाघों की मौजूदगी ने लखीमपुर खीरी को भारतीय वन्य जीव मानचित्र पर एक विशेष स्थान दिलाया है। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए मोहम्मदी वन प्रभाग ने वर्ष 2025–26 के लिए बाघों की गणना अभियान की शुरुआत कर दी है। इस अभियान के तहत मोहम्मदी रेंज के महेशपुर, देवीपुर, सहजनीय और आंवला बीट में कुल 40 कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। कैमरों की स्थापना प्रशिक्षित रोहित श्रीवास्तव और वन दरोगा अखिलेश सिंह के नेतृत्व में सावधानीपूर्वक की गई।
लगाए गए 40 कैमरे
बाघ गणना वन विभाग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है, क्योंकि इससे न केवल बाघों की वास्तविक संख्या का पता चलता है, बल्कि उनकी गतिविधियों, मूवमेंट पैटर्न, प्रजनन स्थिति और सुरक्षा से जुड़े कारकों का भी वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। कैमरा ट्रैप सर्वे आधुनिक वन प्रबंधन का सबसे विश्वसनीय तरीका माना जाता है, क्योंकि इसमें किसी भी मानवीय हस्तक्षेप या अनुमान की गुंजाइश नहीं रहती। बीट स्तर पर लगाए गए प्रत्येक कैमरे में सेंसर लगाया जाता है, जो बाघ, तेंदुआ, हिरण, सियार, ऊदबिलाव सहित अन्य जंगली जीवों की गतिविधियों को स्वतः रिकॉर्ड करता है। मोहम्मदी वन प्रभाग में लगाए गए इन 40 कैमरों को ऐसे स्थानों पर स्थापित किया गया है, जहाँ वन्यजीवों की आवाजाही अधिक होती है—जैसे कि नाले, पगडंडियाँ, जल स्रोतों के आसपास, जंगल की गहराई में बने प्राकृतिक रास्ते और बाघों के संभावित गलियारे। कैमरे लगाने वाली टीम में शामिल प्रशिक्षित रोहित श्रीवास्तव और वन दरोगा अखिलेश सिंह ने बताया कि कैमरा ट्रैप की स्थापना एक संवेदनशील और तकनीकी काम है, जिसमें दूरी, ऊँचाई, कैमरे का एंगल और लोकेशन का सावधानीपूर्वक चयन किया जाता है। किसी भी छोटी गलती से कैमरा तस्वीरें रिकॉर्ड नहीं कर पाता या वन्यजीव उसमें कैद नहीं हो पाते।
Lakhimpur Kheri: जंगल तक सुरक्षित आवाजाही का रास्ता
बाघ संरक्षण के लिए यह क्षेत्र बेहद अहम है। लखीमपुर खीरी की सीमाएँ दुधवा टाइगर रिजर्व से सटी होने के कारण मोहम्मदी रेंज के जंगल बाघों के लिए प्राकृतिक कॉरिडोर की तरह काम करते हैं। यह कॉरिडोर बाघों को एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित आवाजाही का रास्ता देता है। यही कारण है कि बाघों की गणना और उनकी गतिविधियों की निगरानी यहाँ हमेशा एक प्राथमिकता रहती है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कैमरा ट्रैप में कैप्चर हुए फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज का विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा किया जाएगा। हर बाघ की शरीर धारी (Stripes Pattern) अलग होती है, जो उसकी “फिंगर प्रिंट” की तरह काम करती है। इन्हीं धारी पैटर्न के आधार पर बाघों की गिनती और उनकी पहचान की पुष्टि की जाएगी। कैमरों की निगरानी प्रतिदिन की जाएगी और किसी भी तकनीकी खराबी को तुरंत ठीक किया जाएगा, ताकि डेटा में किसी भी प्रकार की कमी न आए।
जंगलों में वन्यजीव संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका
इस अभियान से वन विभाग को न केवल बाघों की संख्या पता चलेगी बल्कि यह भी जानकारी मिलेगी कि किस क्षेत्र में उनकी गतिविधि अधिक है, कौन-से रास्ते वे प्राकृतिक रूप से इस्तेमाल करते हैं और क्या किसी नए जोड़े ने जंगल में जन्म दिया है। यह जानकारी भविष्य में वन्यजीव संरक्षण रणनीतियाँ तैयार करने, अवैध शिकार रोकने और जंगलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। स्थानीय ग्रामीणों को भी वन विभाग ने इस गणना अभियान के बारे में जागरूक किया है। लोगों को बताया गया है कि कैमरों को न छेड़ें और जंगल में अनावश्यक आवाजाही से बचें। ग्रामीणों ने भी इस कार्य में सहयोग का आश्वासन दिया है, क्योंकि वे समझते हैं कि स्वस्थ वन्यजीव आबादी पर्यावरण, खेती-बाड़ी और आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी आवश्यक है।
मोहम्मदी वन प्रभाग का यह प्रयास बाघ संरक्षण के क्षेत्र में एक मजबूत कदम है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे कैमरों से डेटा प्राप्त होगा, बाघों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और इससे क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा मिलेगी। वन विभाग की यह सक्रियता लखीमपुर खीरी को वन्यजीव सुरक्षा के मानचित्र पर और अधिक मजबूत बनाएगी।
Report By: संजय कुमार राठौर







